Sunday, 15 May 2011

आरएएस अफसर को भारी पड़ा पुलिस का पंगा

एक कहावत है कि पुलिस की तो न दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी। गृह विभाग में उप सचिव स्तर के एक आरएएस अफसर को पुलिस वालों से पंगा लेना भारी पड़ा गया। कैरियर के बीच में ही इन महाशय को  भ्रष्ट होने का तमगा लेकर जेल जाना पड़ गया। ऊपर से निलंबित हो गए सो अलग। इस पर भी पुलिस वालों की ज्यादती देखिए कि जेल में भी एक अफसर को यह देखने के लिए भेजा गया कि कहीं आरएएस होने  के कारण अधिकारी को विशेष सुविधाएं तो मुहैया नहीं कराई गई हैं। 
रिश्वत खाने के आरोप में  पकड़े गए एक पुलिस सिपाही से ही रिश्वत लेने के आरोप में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने गृह विभाग के उप सचिव अनिल पालीवाल और उनके  एक क्लर्क को 11 मई को रंगे हाथों पकड़ लिया। तलाशी में उप सचिव के घर से नगर निगम की भी कुछ फाइलें मिलीं, जबकि निगम से उनका तबादला काफी पहले ही हो चुका था। ये फाइलें किसी के भुगतान से संबंधित थीं। 
गृह विभाग के उप सचिव के  घूस खाने के मामले में पकड़े जाने की घटना से पॉवर गेलेरी में खलबली मच गई। इसकी वजह ये नहीं थी कि सचिवालय का कोई अफसर पहली बार इस तरह के मामले में फंसा था। बल्कि वजह ये थी कि आखिर गृहमंत्री शांति धारीवाल के विभागों में ही एसीबी क्यों इतनी तत्परता दिखा रही है। इससे पहले भी नगरीय विकास विभाग में उप सचिव स्तर के ही एक अफसर को भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ा जा चुका था। उनके खिलाफ जांच में क्या मिला, एसीबी ने आज तक इसका खुलासा नहीं किया है। पॉवरफुल लोगों ने मामले की तह में जाने के लिए जासूस दौड़ाए। 
अंदर की जो खबर मिली, उसने पॉवरफुल लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि एक  उप सचिव और वो भी आरएएस की  इतनी हिम्मत की उन लोगों से पंगा ले जो खुद दूसरों को फंसाने और बचाने के लिए रिश्वत खाते हैं। अपराधियों को पकड़े वाली पुलिस को बेअक्ल बताए। जांच-पड़ताल में पता चला कि उप सचिव महोदय ने एसीबी के एक बड़े अफसर की एक्सटेंशन का मामला अटका रखा था। ऊपर से ये कमेंट्स की पुलिस वालों में अक्ल तो होती नहीं है, सिफारिश से काम करवाना चाहते हैं, लेते-देते कुछ है नहीं। चर्चा ये भी कि पालीवाल के पास विधि विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक पद का भी चार्ज था। जबकि सेवानिवृत निदेशक माथुर को सरकार एक महीने पहले ही छह माह का एक्सटेंशन दे चुकी थी, लेकिन उनके भी वे आदेश जारी नहीं कर रहे थे। पिछली सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाए गए माथुर आयोग के उप सचिव का भी कार्यभार था। इससे भी बडा आश्चर्य ये कि इनका तबादला एक माह पहले ही चिकित्सा विभाग में कर दिया गया था, लेकिन ये गृह विभाग में अफसरी का मोह नहीं छोड़ पा रहे थे। ऐसा क्या पता था कि उप सचिव महोदय खुद ही भ्रष्टाचार के मामले में फंस जाएंगे। जय  हो ब्यूरोक्रेसी।

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