Thursday, 26 May 2011

जातीय जनगणना का फायदा आखिर किसे?

देश में जल्दी ही जातीय जनगणना शुरू होने वाली है। इसे लेकर देशभर में एक बहस छिड़ी हुई है। आखिर जातीय जनगणना की जरूरत क्यों है?  इससे फायदा किसे और क्या होगा? मेरे जैसे ज्यादातर लोगों का मानना है कि  कांग्रेस अपने राजनीतिक फायदे के लिए जातीय जनगणना करवा रही है। जातीय वोट बैंक पर कब्जा करने में आसानी को देखते हुए अन्य राजनीतिक दल भी इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं। अधिकांश लोगों का मानना है कि क्या गरीबी और पिछड़ेपन का आधार जाति होगी। अगर जाति होगी तो पिछले 60 साल से आरक्षण दिया जा रहा है, फिर अब तक गरीबी और पिछड़ापन दूर क्यों नहीं हुआ। इस अवधि में गरीबी दूर होने के बजाय अति गरीब (अन्नपूर्णा) की नई श्रेणी बन गई। पिछड़ों में भी अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ साथ विशेष पिछड़ा वर्ग और आर्थिक पिछड़ा वर्ग की नई श्रेणियां बनाई गई हैं। 
जातिवाद का जो जहर इस देश के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण में घोला गया है उसकी कीमत आज हमें ही चुकानी पड़ रही है। जातीय संघर्ष, दंगे-फसाद की घटनाएं आम हो गई हैं। आज भी कई राज्यों में जातिवाद और क्षेत्रीय एवं भाषावाद समस्या बने हुए हैं। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन,  दिल्ली और आसपास के इलाके में जाट आंदोलन, पदोन्नतियों में आरक्षण के खिलाफ सवर्ण वर्ग के कर्मचारियों का आंदोलन आदि को ताजा उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे में जातीय जनगणना कराना क्या उचित है। इसमें भी हाल ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति के अध्यक्ष पी.एल. पूनिया का बयान और भी आग में घी डालने वाला है। उन्होंने कहा है कि अनुसूचित जाति का सदस्य होने का मतलब ही पिछड़ा होना है।
जातीय जनगणना से समस्याएंः   
१. मुझे लगता है कि जातीय जनगणना के बाद हर जाति और वर्ग को देश में उनकी वास्तविक जनसंख्या का ज्ञान हो जाएगा। इसके बाद हर जाति अपनी अपनी मांगों को लेकर आंदोलन में उतर सकती है। वोट बैंक के दवाब में सरकारों को उनकी अनुचित मांगें माननी पड़ सकती हैं। 
२. एक जाति की किसी भी वाजिब या गैरवाजिब मांग का दूसरी जाति विरोध कर सकती है। इससे जातीय संघर्ष की घटनाओं को बढ़ावा मिलेगा। 
३. देश में छुआछूत खत्म होने के बजाय इसमें इजाफा होगा। गरीब और अमीर के कारण एक ही जाति में वर्ग बन सकते हैं और उनमें भी संघर्ष हो सकता है। 
४. राजनीतिक दल जातीय आधार पर ही चुनाव लड़ेंगे, वे अभी भी लड़ते हैं। संभव है कि भविष्य जातिय राजनीतिक दल भी पनप आएं। जिन जातियों की जनसंख्या कम होगी, उन्हें अपना हक प्राप्त करने में ज्यादा परेशानी होगी। 
ये हो सकते हैं समाधानः 
१. पिछड़ेपन का आधार जाति न होकर केवल आर्थिक आधार ही हो। जो लोग कर योग्य आय सीमा (इनकम टैक्स लिमिट) से नीचे हैं, उन्हें पिछड़ा हुआ माना जाए। जो टैक्स भरते हैं, उन्हें सामान्य वर्ग में रखा जाए। वास्तविक पिछड़ेपन का पता लगाने के लिए बिजली, पानी, मोबाइल  के बिल, बैंक खाते आदि की जांच की जा सकती है। 
२. मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए। केवल योग्यता के आधार पर ही नौकरियों में चयन हो। यदि गरीबों अथवा पिछड़ों को विकास की मुख्य धारा में लाना है तो उन्हें केवल शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग दिया जाना चाहिए। जैसे फीस में रियायत दी जा सकती है। किताबें, कोचिंग आदि की व्यवस्था की जा सकती है।  उन्हें अच्छे संस्थानों में प्रवेश दिलाने में सहायता की जा सकती है। 
३. विभिन्न तरह के सरकारी फार्मों, बैंक लोन, आदि में जाति का उल्लेख बंद कर देना चाहिए। केवल नागरिकता ही लिखी जानी चाहिए। पहचान के लिए अब तो यूनिक आईडी नंबर की व्यवस्था की जा रही है। 
४. प्रत्येक पांच वर्ष में इस बात के आंकड़े प्रकाशित किए जाने चाहिए कि सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के कारण कितने लोगों का पिछड़ापन दूर हुआ। यदि पिछड़ों की संख्या बढ़ी तो उसके क्या कारण रहे और उसके लिए जिम्मेदार कौन है। 
५. चुनाव में सभी राजनीतिक दलों के एजेंडे में भी इस बात का उल्लेख होना चाहिए कि वे अपने कार्यकाल में कितने लोगों का पिछड़ापन दूर करेंगे। अथवा सत्ता में रहते हुए कितनों का पिछड़ापन दूर किया और क्या कार्यक्रम लागू किए। 
६. सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों के जातीय संगठनों के कार्यक्रमों में शामिल होने पर रोक लगानी चाहिए।

Sunday, 22 May 2011

प्रमुख शासन सचिव को एमडी ने कराया इंतजार

राज्य सहकारी उपभोक्ता संघ की प्रबंध निदेशक मंजरी भांती ने  राष्ट्रीय सहकारी मसाला मेले के समापन कार्यक्रम में सहकारिता विभाग के प्रमुख सचिव तपेश पंवार को करीब 15 मिनट का इंतजार करवा दिया। पंवार ने एमडी के इस दुस्साहस पर खासी नाराजगी जाहिर की। इसके लिए एमडी को समापन कार्यक्रम में ही सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी। 
हुआ यह कि मेले के समापन समारोह के लिए 21 मई को प्रमुख सचिव को शाम 6.30 बजे का समय दिया गया था। पंवार निर्धारित समय पर कार्यक्रम में पहुंच गए। वहां वे ये देखकर हैरान रह गए कि उस समय तक तो स्टॉल धारकों और अन्य लोगों को दिए जाने वाले प्रमाण पत्र ही तैयार हो रहे थे। जब उन्होंने ज्यादा पड़ताल की तो पता चला कि उपभोक्ता संघ की एमडी खुद कुछ क्षण पहले ही मेला स्थल पर पहुंची थी। उनकी लापरवाही से कार्यक्रम करीब 20 मिनट देरी से शुरू हुआ। तब तक प्रमुख सचिव को वहां मेले में ही इंतजार करना पड़ा। 
पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि मेले के दौरान चार दिन एमडी मंजरी खुद  वीवीआईपी बनी रहीं। जबकि सहकारिता विभाग के अतिरिक्त रजिस्ट्रार तक समय  पर मेले में पहुंचते रहे। मेले के आयोजन को लेकर भी काफी सवाल उठ रहे हैं। चर्चा है कि जब तक इस मेले के आयोजन की जिम्मेदारी सहकारिता विभाग के पास रही तब तक किसी को भी व्यवस्थाओं से कोई शिकायत नहीं रही, लेकिन पिछले तीन साल से जब से उपभोक्ता संघ ने इस आयोजन की जिम्मेदारी संभाली है, तब से मेले में अव्यवस्थाओं का ही बोलबाला ज्यादा रहा है। 
सहकारिता विभाग की पॉवर गेलेरी के रसूखदारों का मानना है कि प्रमुख सचिव तपेश पंवार की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई है। अगले कुछ दिनों में इसकी गाज उपभोक्ता संघ के अधिकारियों पर गिर सकती है। इससे पहले भी उपभोक्ता संघ के एमडी सोमदत्त को एपीओ किया जा चुका है। जय सहकार।

Tuesday, 17 May 2011

पेट्रोल ने लगाई टाटा के सपने में आग

इस देश में आम आदमी की बात तो छोड़िये, सपने देखने का हक शायद टाटा जैसे बड़े लोगों को भी नहीं है। सत्ता में बैठे मठाधीशों और अफसरों ने तय कर लिया है कि इंडिया में कोई भी सपना केवल वही देखेंगे और उसे पूरा करने का हक भी सिर्फ उन्हीं को है। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में 5 रुपए  लीटर की बढ़ोत्तरी करके आम आदमी को फिर से साइकिल और दुपहिया वाहन पर ही चलने की ही हैसियत याद दिलाई है। 
टाटा ने लखटिया कार के रूप में नैनो की कल्पना करके आम आदमी के कार के सपने को पूरा करने की कोशिश की। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने बहुसंख्यक जनता के सपनों को उड़ान दी, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को इसमें टाटा का धंधा ही नजर आया, सो तुरंत पेट्रोल की कीमतें बढ़ा दी। इतना ही नहीं आम आदमी को तो बस में सफर करने लायक भी नहीं छोड़ा जा रहा है, सो अब सरकार डीजल की दरें भी बढ़ाने के प्रयास में है। गैस के दाम बढ़ाकर उसके  निवाले की मात्रा भी कम की जाएगी। मंत्रियों, अफसरों के क्या फर्क पड़ने वाला है, पेट्रोल और डीजल भले ही 500 रुपए लीटर क्यों न हो जाए। उनका खर्च तो सरकारी खजाने से होना है। 
अब समझ नहीं आता कि एक तरफ तो देश में महंगाई तांडव कर रही है। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है । रिजर्व बैंक के गर्वनर से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह तक चिंता व्यक्त कर रहे हैं। दूसरी तरफ पेट्रोल और डीजल पर दाम बढ़ाए जा रहे हैं। इनके दाम बढ़ाने से क्या महंगाई कम हो जाएगी, या भ्रष्टाचार में कमी आएगी ? पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने से महंगाई बढ़ेगी। महंगाई बढ़ेगी तो भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिस अधिकारी अथवा नेता पर घोटाले के आरोप सिद्ध हो जाएं तो उसकी और उसके परिवार की पूरी संपत्ति जब्त करके सरकार के सुपुर्द कर दी जाए। विकास कार्यों में जिन इंजीनियरों, अफसरों की गलती पाई जाए अथवा ठेकेदार कंपनियों की गलतियां मिलें तो उनसे पूरी रकम की ब्याज सहित वसूली हो और भविष्य के लिए उन्हें सभी तरह के सरकारी कामकाज के लिए ब्लैकलिस्टेड कर दिया जाए। 
स्विस बैंक के अधिकारियों ने खुलासा किया है कि उनके बैंकों में इंडिया का 280 लाख करोड़ रुपए जमा हैं। यह पैसा हमारी ही गाढी़ कमाई है, जो टैक्स चोर राजनेताओं और अफसरों ने वहां पर जमा कराया है। इतने पैसे का इस्तेमाल वे अपने जीवन में शायद ही कर पाएं। एक अनुमान के अनुसार 30 साल तक इंडिया को टैक्स रहित बजट दिया जा सकता है। हमारी केन्द्र सरकार को इन टैक्स चोरों के नाम तक बताने में शर्म आ रही है। फिर इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनाने का सपना तो छोड़ ही दीजिए। क्यों नहीं इस पैसे को देश में लाकर आम आदमी के सपने को पूरा करने की कोशिश की जाए। लेकिन कोशिश तो तब होती है, जब कोई जिंदा हो, लेकिन इस देश का आम आदमी तो मरा हुआ है, वह अपने हकों के लिए बोलना और लड़ना तो सीखा ही नहीं है। वे बिरले तो अब इस दुनिया से ही चले गए जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। अब तो इस देश में कुर्बानी देने वालों की नहीं बल्कि कुर्बानी लेने वालों की आबादी बढ़ रही है। जय जवान, जय किसान, जय हिंदुस्तान।


राजस्थान में पुलिस के पीछे पड़ी सीबीआई

राजस्थान में इन दिनों गुजरात जैसा नजारा है। यहां पुलिस के पीछे सीबीआई जो पड़ी है। अब तक अपराधियों को दौड़ाते रहे पुलिस के आला अफसर सीबीआई के डर से अब खुद दौड़ रहे हैं। फर्जी मुठभेड़ के मामले में एक आईपीएस पोन्नूचामी दो दिन की पुलिस कस्टडी में हैं, जबकि एडीजी ए.के. जैन और एडीशनल एसपी अऱशद अली सीबीआई को मिल नहीं रहे हैं। सीबीआई ने इनके लिए अदालत से गिरफ्तारी वारंट भी ले लिया है।
मुद्दा ये नहीं है कि फर्जी मुठभेड़ के मामले में पुलिस के आला अफसर फंसे हैं। मुद्दा ये है कि जब गिरफ्तारी होती है, अथवा खुद पुलिस की पूछताछ और जांच का सामना करना पड़ता है, तब कैसा अनुभव रहता है?  जो एडीशनल एसपी अरशद अली अब गिरफ्तारी के भय से भाग रहे हैं,  उन्हीं के निर्देशन में कुछ साल पहले पुलिस ने जयपुर में ही सात लोगों पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर हत्या जैसा वो जुर्म कबूल करवा लिया था, जो उन्होंने किया ही नहीं था। यानी सात जनों को एक जिंदा महिला की हत्या के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। तब उन निर्दोषों को कैसा लगा होगा?
आईजी स्तर के अधिकारी पोन्नूचामी के वकील ने सीबीआई पर आरोप लगाया कि उन्हें 5 घंटे तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। जबकि पोन्नूचामी खुद जानते हैं कि उन्होंने अपने कैरियर में पूछताछ के नाम पर कितने लोगों को इस तरह से अवैध हिरासत में रखा। उन्हें या तो बाद में छोड़ दिया गया अथवा अदालत का दवाब आने पर गिरफ्तारी दिखाई गई। अभी तो गनीमत है कि आईजी साहब ने सीने में दर्द, कमजोरी और चक्कर आने की शिकायत नहीं की है। अन्यथा बड़े लोगों में वीपी, डायबिटीज, सीने में दर्द, कमजोरी जैसी पुरानी बीमारियां अचानक उखड़ आती हैं।
फर्जी मुठभेड़ मामले में पकड़े गए अन्य पुलिस कर्मियों में से भी एक ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि उन पर राजनेता राजेन्द्र राठौड़ का नाम लेने के लिए दवाब डाला जा रहा है। उन्हें प्रताड़ित किया गया है। क्या पुलिस कर्मियों की इस कहानी पर आम जनता को भरोसा होगा?  जो खुद पुलिस की कार्य प्रणाली से आए दिन गुजरती हैं। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि समय-समय की बात है एक वक्त वो भी था जब एडीजी जैन साहब की पुलिस मुख्यालय से लेकर मंत्रालय, सचिवालय तक तूती बोलती थी। फिलहाल तो आला अफसरों की गिरफ्तारी पर नजर है, क्योंकि राजस्थान के एक आईपीएस मधुकर टंडन आज तक गिरफ्त से बाहर हैं, उन पर अपने ही अर्दली की पत्नी से ज्यादती करने का आरोप है। जय जय राजस्थान।

Sunday, 15 May 2011

आरएएस अफसर को भारी पड़ा पुलिस का पंगा

एक कहावत है कि पुलिस की तो न दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी। गृह विभाग में उप सचिव स्तर के एक आरएएस अफसर को पुलिस वालों से पंगा लेना भारी पड़ा गया। कैरियर के बीच में ही इन महाशय को  भ्रष्ट होने का तमगा लेकर जेल जाना पड़ गया। ऊपर से निलंबित हो गए सो अलग। इस पर भी पुलिस वालों की ज्यादती देखिए कि जेल में भी एक अफसर को यह देखने के लिए भेजा गया कि कहीं आरएएस होने  के कारण अधिकारी को विशेष सुविधाएं तो मुहैया नहीं कराई गई हैं। 
रिश्वत खाने के आरोप में  पकड़े गए एक पुलिस सिपाही से ही रिश्वत लेने के आरोप में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने गृह विभाग के उप सचिव अनिल पालीवाल और उनके  एक क्लर्क को 11 मई को रंगे हाथों पकड़ लिया। तलाशी में उप सचिव के घर से नगर निगम की भी कुछ फाइलें मिलीं, जबकि निगम से उनका तबादला काफी पहले ही हो चुका था। ये फाइलें किसी के भुगतान से संबंधित थीं। 
गृह विभाग के उप सचिव के  घूस खाने के मामले में पकड़े जाने की घटना से पॉवर गेलेरी में खलबली मच गई। इसकी वजह ये नहीं थी कि सचिवालय का कोई अफसर पहली बार इस तरह के मामले में फंसा था। बल्कि वजह ये थी कि आखिर गृहमंत्री शांति धारीवाल के विभागों में ही एसीबी क्यों इतनी तत्परता दिखा रही है। इससे पहले भी नगरीय विकास विभाग में उप सचिव स्तर के ही एक अफसर को भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ा जा चुका था। उनके खिलाफ जांच में क्या मिला, एसीबी ने आज तक इसका खुलासा नहीं किया है। पॉवरफुल लोगों ने मामले की तह में जाने के लिए जासूस दौड़ाए। 
अंदर की जो खबर मिली, उसने पॉवरफुल लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि एक  उप सचिव और वो भी आरएएस की  इतनी हिम्मत की उन लोगों से पंगा ले जो खुद दूसरों को फंसाने और बचाने के लिए रिश्वत खाते हैं। अपराधियों को पकड़े वाली पुलिस को बेअक्ल बताए। जांच-पड़ताल में पता चला कि उप सचिव महोदय ने एसीबी के एक बड़े अफसर की एक्सटेंशन का मामला अटका रखा था। ऊपर से ये कमेंट्स की पुलिस वालों में अक्ल तो होती नहीं है, सिफारिश से काम करवाना चाहते हैं, लेते-देते कुछ है नहीं। चर्चा ये भी कि पालीवाल के पास विधि विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक पद का भी चार्ज था। जबकि सेवानिवृत निदेशक माथुर को सरकार एक महीने पहले ही छह माह का एक्सटेंशन दे चुकी थी, लेकिन उनके भी वे आदेश जारी नहीं कर रहे थे। पिछली सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाए गए माथुर आयोग के उप सचिव का भी कार्यभार था। इससे भी बडा आश्चर्य ये कि इनका तबादला एक माह पहले ही चिकित्सा विभाग में कर दिया गया था, लेकिन ये गृह विभाग में अफसरी का मोह नहीं छोड़ पा रहे थे। ऐसा क्या पता था कि उप सचिव महोदय खुद ही भ्रष्टाचार के मामले में फंस जाएंगे। जय  हो ब्यूरोक्रेसी।

Wednesday, 11 May 2011

आखिर अफसरों पर ही आकर गिरी गाज

मंत्रियों और अफसरों में टकराहट की गाज आखिर फिर अफसरों पर ही आकर गिरी है। मंत्रियों से पटरी नहीं बैठ पाने के कारण जहां सार्वजनिक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. दिनेश गोयल और जेडीए आयुक्त सुधांश पंत को जाना पड़ा है। वहीं  पुलिस के सीआई को जिंदा जलाए जाने की घटना  और लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने के कारण सवाई माधोपुर कलेक्टर रवि सुरपुर को भी खामियाजा भुगतना पडा है। 
पॉवर गैलेरी में चर्चा है कि ई टेंडरिंग को लेकर पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव दिनेश गोयल की मंत्री प्रमोद जैन भाया से पटरी नहीं बैठ रही थी। भाया के तमाम विरोध के बावजूद गोयल ने 50 लाख रुपए के काम पर ही ई टेंडरिंग की व्यवस्था लागू कर दी थी, जबकि पहले यह  व्यवस्था 5 करोड़ रुपए या इससे अधिक  राशि के काम पर ही थी।  जैन और गोयल के टकराव का मामला सीएम तक भी पहुंच गया था। इसी तरह जेडीए आयुक्त सुधांश पंत की भी नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल से पटरी नहीं बैठ पा रही थी। अजमेर रोड पर मुर्गीखाने की जमीन के मामले में सिविल वाद दायर करने को लेकर धारीवाल और पंत की टकराहट जगजाहिर हो गई थी। धारीवाल तभी से पंत को हटाए जाने के लिए अड़े हुए थे। इसी तरह सवाई माधोपुर कलेक्टर रवि सुरपुर को भरतपुर संभागीय आयुक्त राजेश्वरसिंह ने सीआई फूलमोहम्मद को जिंदा जलाए जाने के मामले में लापरवाही का दोषी माना था। यह रिपोर्ट दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री तक पहुंची थी। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि जल्दी ही कुछ और अफसरों पर भी गाज गिर सकती है।

Saturday, 7 May 2011

अन्याय सहन नहीं कर सके आईपीएस, छुट्टी पर गए

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हवासिंह घुमरिया अपने साथ अन्याय सहन नहीं कर सके और 90 दिन की छुट्टी पर चले गए। हुआ यह कि जयपुर में डीसी के पद पर काम कर रहे घुमरिया की पदोन्नति डीआईजी के पद पर हो चुकी थी। वे जयपुर में या तो अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर बनना चाहते थे, अथवा जयपुर के बाहर डीआईजी पद पर लगना चाहते थे। पुलिस महकमे में चर्चा है कि उनसे एसपी का ही काम लिया जा रहा था। जबकि जयपुर में दो डीआईजी को अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर लगाया जा चुका था। समान पद के अधिकारियों से निर्देश मिलने के कारण घुमरिया स्वयं को असहज महसूस कर रहे थे। इसलिए उन्होंने छुट्टियों पर जाना ही बेहतर समझा। उन्हें शायद उम्मीद है कि इस बीच आईपीएस अधिकारियों की तबादला सूची आ सकती है, जिसमें शायद उनके साथ न्याय हो जाए।