Monday, 24 January 2011

सरकार को भारी पड़ सकती सवर्णों की नाराजगी

मौजूदा राज्य सरकार के प्रति सरकारी नौकरियों और पदोन्नतियों में आरक्षण को लेकर अब सवर्ण वर्ग में नाराजगी बढ़ती जा रही है। आने वाले चुनाव में यह नाराजगी कांग्रेस को भारी भी पड़ सकती है। सवर्ण वर्ग के लोगों को लगने  लगा है कि वोटों की राजनीति के खातिर राज्य सरकार न केवल उनके हक छीन रही है, बल्कि हाल ही आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं करके उनके साथ अन्याय भी कर रही है। वोट बैंक के आधार पर अनुसूचित जाति और जनजाति का दबाव का मुकाबला करने के लिए अब सवर्ण जातियां भी लामबंद होने लगी हैं। इसके लिए राजस्थान में बाकायदा मिशन 72 शुरू किया गया है। इस मिशन का उद्देश्य है कि सरकार 28 प्रतिशत लोगों के खातिर 72 प्रतिशत लोगों का गला घोंट रही है। इस मिशन के तहत लोगों को अपने हकों के लिए राजनीतिक रूप से जागृत किया जाने लगा है और वोट के बल पर अपना हक लेने की बात की जा रही है। उन्हें लगने लगा है कि आरक्षण की वजह से उनके लिए नौकरियों और पदोन्नतियों के अवसर अब समाप्त हो रहे हैं। सवर्ण वर्ग के अधिकारी और कर्मचारियों में नाराजगी इस कदर बढ़ चुकी है कि आने वाले चुनावों में इसके परिणाम साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। वर्ष 2003 के चुनाव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को कर्मचारियों की नाराजगी पहले ही भारी पड़ चुकी है। सचिवालय और अन्य सरकारी महकमों में इन दिनों सवर्ण वर्ग के अधिकारी और कर्मचारी आरक्षण से होने वाले नुकसान को लेकर पीड़ा जाहिर करते नजर आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए सवर्ण वर्ग का कहना है कि पदोन्नतियों में आरक्षण समाप्त हो चुका है। सरकार को इस फैसले की पालना में अब तक हुई पदोन्नतियों की समीक्षा करके सवर्ण वर्ग के लोगों को मूल वरीयता (रीगेनिंग) देनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने अवमानना के भय से सभी विभागों की पदोन्नतियां ही रोक दीं। इससे उन सवर्ण अधिकारी और कर्मचारियों को नुकसान हो रहा है जो अगले एक - दो महीने में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इनका तर्क है कि केवल अनुसूचित जाति, जनजाति की पदोन्नतियां ही रुकनी चाहिए थीं। दूसरा तर्क यह भी है कि कमजोर और पिछड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ केवल नौकरी में आने पर ही मिलना चाहिए। नौकरी में आने के बाद आरक्षित वर्ग के अधिकारी, कर्मचारी का पिछड़ापन नहीं रह जाता, बल्कि उसका भी सामाजिक, आर्थिक स्तर ऊपर उठ जाता है। सरकारी सेवा में आ चुके लोगों को आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी और पदोन्नतियों में भी लाभ देना कहां तक उचित है। जबकि दूसरी ओर आरक्षित वर्ग के लोगों का तर्क है कि सरकारी नौकरियों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने का तर्क गलत दिया जा रहा है। वास्तविकता यह है कि उनके पदों पर आज भी बैकलॉग चल रहा है। उनका समाज आज भी सामाजिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। 
आरक्षण को लेकर राजस्थान में एक और आश्चर्यजनक चीज देखने को मिल रही है, वो है लोग आगे बढ़ने के बजाय पिछड़ा होने में ज्यादा सुख अनुभव कर रहे हैं। गुर्जर जहां  अन्य पिछड़ा वर्ग में से अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग कर रहा है, वहीं ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत भी अपने को पिछड़ा हुआ बताकर आरक्षण की मांग कर रहे हैं। गुर्जरों के दबाब को देखते हुए पिछली सरकार ने विशेष पिछड़ा वर्ग की नई श्रेणी बना दी थी, लेकिन इससे मामला शांत होता नजर नहीं आ रहा है। इधर, सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लेकर मुस्लिम समुदाय में भी आरक्षण की मांग का अंकुर फूट रहा है। ये समुदाय भी कभी भी अपनी मांग को लेकर सड़कों पर आ सकता है। राजनीतिक दलों ने जिस आरक्षण को सत्ता में आने का हथियार बनाया, आने वाले दिनों में वही आरक्षण राजनीतिक दलों को सत्ता से बाहर करने का हथियार बनेगा।

1 comment:

jeengar ds gahlot said...

Giriraj ji, "sarkar ko bhari par sakti hai sawarno ki narajagi" samachar hamare desh ke bhagwadhari hindutav vadi thekedaron ke us khatarnak mukhotadhari chehre ko ujagar kar raha hai, jisme muslimo or esaiyon ke sath hi dalit jatiyon ke prati bame huye nafrat bhav ko ab khule roop me jahir kar raha hai. En bhawa dhariyon ki dekh-rekh me shuru hua "Misan 72", aakhir yahi to batla raha hai. Aap, ek patrakar hone or sawaran varge se hone ke karan, es "Misan 72" ko kis vichar ke sath mahsoos karte hai - yah aap jane. Lekin, hamare vichar se yah "Misan 72" hindu varge ke vibhajan ke liye kafi khatarnak sabit hoga, yadi ese nahi roka gaya to ---. - Jeengar Durga Shankar Gahlot, Makbara Bazar, Kota - 324 006 (Raj.); Mob. 098872-32786