Wednesday, 26 January 2011

आईएएस को आया गुस्सा, बाबू को रिलीव करके भेजा

नगरीय विकास विभाग में प्रमुख सचिव जी.एस. संधू का गुस्सा पिछले कुछ समय से चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि इस गुस्से की वजह भी विभाग का एक बाबू ही रहा, और उस बाबू को ही भुगतना पड़ गया। हालांकि संधू बहुत ही शांत स्वभाव के हैं, लेकिन इस बार उन्हें लोकायुक्त के यहां पेशी को लेकर गुस्सा आया। हुआ यह कि संधू को एक मामले में लोकायुक्त के यहां पेश होना था, लेकिन वे उस मामले में पहले ही लोकायुक्त कार्यालय में आग्रह करके तारीख बढ़वाने के निर्देश दिए थे। इस संबंध में पत्र भी तैयार हो गया था। उस पर संधू ने हस्ताक्षर भी कर दिए थे, लेकिन यह पत्र लोकायुक्त सचिवालय को भेजा ही नहीं गया था? जब संधू ने पेशी पर जाने के लिए फाइल मांगी तो अधूरी फाइल आई। उसी फाइल में ही वह पत्र मिल गया जिस पर संधू ने हस्ताक्षर किए थे। उस पत्र को देखकर ही संधू को गुस्सा आया और तुरंत संबंधित बाबू को रिलीव कर दिया।
मामला यहीं शांत नहीं हुआ। काम में ढिलाई बरतने और छुट्टियों पर रहने के कारण उप सचिव निष्काम दिवाकर से जेडीए का काम लेकर दूसरे उप सचिव पुरुषोत्तम बियानी को दे दिया। पावर गैलेरी में चर्चा है कि जेडीए का काम देखने वाले नगरीय विकास विभाग के बाबू की लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि उसका अधिकांश समय सचिवालय की कामत केंटीन में पार्टियों के साथ गुजरता था। जेडीए को लेकर और भी कुछ गुल खिलने वाले हैं।

Tuesday, 25 January 2011

पुरस्कृत होने की उम्मीद लगाए बैठे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरा

गणतंत्र दिवस के अवसर पर बुधवार को होने वाले राज्य स्तरीय समारोह में पुरस्कृत होने वाले कई लोगों की उम्मीदों पर इस बार पानी फिर गया। संभवतः ऐसा पहली बार हुआ है  जब मुख्यमंत्री सचिवालय, सामान्य प्रशासन विभाग और कार्मिक विभाग से किसी भी अधिकारी अथवा कर्मचारी का राज्य स्तरीय समारोह में पुरस्कृत करने के लिए चयन नहीं किया गया है। अब तक यह एक परिपाटी सी बनी हुई थी कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस समारोह में हर बार सीएमओ, जीएडी और डीओपी से एक एक अधिकारी अथवा कर्मचारी को सम्मानित किया जाता था।
पुरस्कार के लिए चयन करने में इस बार सामान्य प्रशासन विभाग की प्रमुख सचिव श्रीमती किरन सोनी गुप्ता का स्पष्ट मत था कि केवल उपकृत (किसी को खुश करने के लिए) राज्य स्तरीय समारोह में पुरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए। पुरस्कार केवल उन्हीं को मिलना चाहिए जो वास्तव में इसके लिए हकदार हों।  

Monday, 24 January 2011

सरकार को भारी पड़ सकती सवर्णों की नाराजगी

मौजूदा राज्य सरकार के प्रति सरकारी नौकरियों और पदोन्नतियों में आरक्षण को लेकर अब सवर्ण वर्ग में नाराजगी बढ़ती जा रही है। आने वाले चुनाव में यह नाराजगी कांग्रेस को भारी भी पड़ सकती है। सवर्ण वर्ग के लोगों को लगने  लगा है कि वोटों की राजनीति के खातिर राज्य सरकार न केवल उनके हक छीन रही है, बल्कि हाल ही आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं करके उनके साथ अन्याय भी कर रही है। वोट बैंक के आधार पर अनुसूचित जाति और जनजाति का दबाव का मुकाबला करने के लिए अब सवर्ण जातियां भी लामबंद होने लगी हैं। इसके लिए राजस्थान में बाकायदा मिशन 72 शुरू किया गया है। इस मिशन का उद्देश्य है कि सरकार 28 प्रतिशत लोगों के खातिर 72 प्रतिशत लोगों का गला घोंट रही है। इस मिशन के तहत लोगों को अपने हकों के लिए राजनीतिक रूप से जागृत किया जाने लगा है और वोट के बल पर अपना हक लेने की बात की जा रही है। उन्हें लगने लगा है कि आरक्षण की वजह से उनके लिए नौकरियों और पदोन्नतियों के अवसर अब समाप्त हो रहे हैं। सवर्ण वर्ग के अधिकारी और कर्मचारियों में नाराजगी इस कदर बढ़ चुकी है कि आने वाले चुनावों में इसके परिणाम साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। वर्ष 2003 के चुनाव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को कर्मचारियों की नाराजगी पहले ही भारी पड़ चुकी है। सचिवालय और अन्य सरकारी महकमों में इन दिनों सवर्ण वर्ग के अधिकारी और कर्मचारी आरक्षण से होने वाले नुकसान को लेकर पीड़ा जाहिर करते नजर आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए सवर्ण वर्ग का कहना है कि पदोन्नतियों में आरक्षण समाप्त हो चुका है। सरकार को इस फैसले की पालना में अब तक हुई पदोन्नतियों की समीक्षा करके सवर्ण वर्ग के लोगों को मूल वरीयता (रीगेनिंग) देनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने अवमानना के भय से सभी विभागों की पदोन्नतियां ही रोक दीं। इससे उन सवर्ण अधिकारी और कर्मचारियों को नुकसान हो रहा है जो अगले एक - दो महीने में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इनका तर्क है कि केवल अनुसूचित जाति, जनजाति की पदोन्नतियां ही रुकनी चाहिए थीं। दूसरा तर्क यह भी है कि कमजोर और पिछड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ केवल नौकरी में आने पर ही मिलना चाहिए। नौकरी में आने के बाद आरक्षित वर्ग के अधिकारी, कर्मचारी का पिछड़ापन नहीं रह जाता, बल्कि उसका भी सामाजिक, आर्थिक स्तर ऊपर उठ जाता है। सरकारी सेवा में आ चुके लोगों को आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी और पदोन्नतियों में भी लाभ देना कहां तक उचित है। जबकि दूसरी ओर आरक्षित वर्ग के लोगों का तर्क है कि सरकारी नौकरियों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने का तर्क गलत दिया जा रहा है। वास्तविकता यह है कि उनके पदों पर आज भी बैकलॉग चल रहा है। उनका समाज आज भी सामाजिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। 
आरक्षण को लेकर राजस्थान में एक और आश्चर्यजनक चीज देखने को मिल रही है, वो है लोग आगे बढ़ने के बजाय पिछड़ा होने में ज्यादा सुख अनुभव कर रहे हैं। गुर्जर जहां  अन्य पिछड़ा वर्ग में से अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग कर रहा है, वहीं ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत भी अपने को पिछड़ा हुआ बताकर आरक्षण की मांग कर रहे हैं। गुर्जरों के दबाब को देखते हुए पिछली सरकार ने विशेष पिछड़ा वर्ग की नई श्रेणी बना दी थी, लेकिन इससे मामला शांत होता नजर नहीं आ रहा है। इधर, सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लेकर मुस्लिम समुदाय में भी आरक्षण की मांग का अंकुर फूट रहा है। ये समुदाय भी कभी भी अपनी मांग को लेकर सड़कों पर आ सकता है। राजनीतिक दलों ने जिस आरक्षण को सत्ता में आने का हथियार बनाया, आने वाले दिनों में वही आरक्षण राजनीतिक दलों को सत्ता से बाहर करने का हथियार बनेगा।

Tuesday, 18 January 2011

मंत्री से पंगा लेकर फंस गए जेडीए आयुक्त

जयपुर विकास प्राधिकरण आयुक्त अपने ही मंत्री से पंगा लेकर फंस गए हैं। दीपावली और नव वर्ष के मौके पर जेडीए की ओर से पत्रकारों को कैश कार्ड बांटने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। हालांकि मामले को दबाने के लिए जेडीए आयुक्त ने अपने स्तर पर जांच बिठा दी थी, लेकिन यह मानते हुए कि पूरे मामले में जेडीए आयुक्त की भूमिका संदिग्ध है, इसलिए नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल ने भी अलग से जांच बिठा दी है। उन्होंने यह जांच नगरीय विकास विभाग के प्रमुख सचिव जी.एस. संधू को दी है। धारीवाल का मानना है कि जेडीए से पत्रकारों को कैश कार्ड बिना आयुक्त की मर्जी के बंट जाएं, ये हो ही नहीं सकता। अपने से कनिष्ठ अधिकारी को जांच देकर जेडीए आयुक्त खुद जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।
जेडीए आयुक्त की मंत्री और प्रमुख सचिव से पटरी नहीं बैठने का मामला इससे पहले भी कई मौकों पर जगजाहिर हो चुका है। इससे पहले अजमेर रोड़ पर मुर्गीखाने की जमीन को लेकर भी मंत्री ने जेडीसी के खिलाफ मुख्यमंत्री को पत्र लिख दिया था। उससे पहले जेडीए आयुक्त के विदेश यात्रा पर चले जाने के बाद कुछ जेडीए फाइलें क्लीयर होने के बाद भी जेडीए आयुक्त द्वारा उन पर क्रियान्विति रोकने से मामला ज्यादा बढ़ गया था। पॉवर गैलेरी में अब यह चर्चा आम हो गई है कि जेडीए आयुक्त अब ज्यादा दिन के मेहमान नहीं हैं।

Wednesday, 12 January 2011

....तब तो राजस्थान सरकार को जवाब देना भारी पड़ जाता

पुलिस ने दो दिन पहले मुख्यमंत्री निवास पर आत्मदाह का प्रयास करने के आरोप में कई एनटीटी (नर्सरी ट्रेंड टीचर्स) छात्रों को गिरफ्तार किया। इस घटना ने मुख्यमंत्री निवास की सुरक्षा व्यवस्था और राज्य की इंटेलीजेंस की एक बार फिर पोल खोलकर रख दी। सुरक्षा एजेंसियों और इंटेलीजेंस को इस बात की भनक तक नहीं थी कि इन छात्रों ने सीएम हाउस के अंदर मुख्यमंत्री के सामने आत्मदाह करने की घटना को अंजाम देने की योजना बना ली थी। अगर समय रहते कुछ मीडिया कर्मी सुरक्षा कर्मियों और इंटेलीजेंस के लोगों को सतर्क नहीं करते तो।
दरअसल पुलिस ने जब इन एनटीटी छात्रों की तलाशी ली तो पता चला कि चार-पांच छात्र पेट्रोल से भरी प्लास्टिक थैलियां कपड़ों में छिपाकर सीएम हाउस के  अंदर तक भी ले गए थे। जहां मुख्यमंत्री आम लोगों से मिलकर जन सुनवाई करते हैं, वहां तक एक-एक करके कुछ छात्र पहुंच गए ताकि किसी को शक न हो। उस समय वहां करीब साढ़े तीन हजार की भीड़ थी। मुख्यमंत्री निवास पर सुरक्षाकर्मी केवल मेटल डिटेक्टर उपकरणों से आगंतुकों की जांच करते हैं। इसमें कपड़ों के अंदर छिपाई गई प्लास्टिक की थैलियां पकड़ में नहीं आई। इसलिए उन्होंने इन छात्रों को भी अंदर तक जाने दिया। बाद में जब सीएम हाउस के बाहर इनकी ज्यादा संख्या बढ़ी तो सुरक्षा कर्मियों और पुलिस की नींद उड़ी। अगर ये छात्र अपने मकसद में कामयाब हो जाते तो मौजूदा राज्य सरकार के चेहरे पर कालिख पुत जाती और जवाब देना तक भारी हो जाता।
यह घटना इसलिए और भी गंभीर तथा आश्चर्यजनक हो जाती है, क्योंकि इन्हीं एनटीटी छात्र-छात्राओं के मामले में इंटेलीजेंस पहले भी दो बार फेल हो चुकी है। पहली बार इंटेलीजेंस तब फेल हुई, जब जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शिक्षा संकुल के सामने गार्डन थियेटर का उदघाटन करने गए थे। तब एनटीटी की छात्राएं उनके काफिले के सामने आ गईं और जमकर नारेबाजी की थी। दूसरी बार इन्हीं एनटीटी छात्र-छात्राओं ने प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में जाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सामने प्रदर्शन किया। तब भी इंटेलीजेंस को इनकी योजना की भनक तक नहीं लगी थी। सीएम के मामले में भी इंटेलीजेंस की बार- बार हो रही ऐसी चूक कहीं कभी बड़े हादसे को जन्म न दे पाए, इसकी कामना की जानी चाहिए। दरअसल ये एनटीटी छात्र कई साल से सरकारी नौकरी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। सरकार को भी गौर करना चाहिए कि जब युवा नौकरी के लिए आत्मदाह जैसे खतरनाक कदम उठाने को तैयार हो जाता है तो जरूर उसकी ऐसी मजबूरी रही होगी। इसे दवाब बनाने का प्रयास मात्र न मानकर उनसे वार्ता करके समस्या का समाधान निकाला जाना चाहिए। इससे पहले भाजपाराज में भी 2 सितंबर 2008 को एनटीटी के छात्र-छात्राएं शिक्षा संकुल पर लाठीचार्ज झेलना पड़ा था।

Saturday, 1 January 2011

संभागीय आयुक्त को भारी पड़ा सीएम के रिश्तेदार से उलझना

राज्य सरकार ने 1980 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और जयपुर के संभागीय आयुक्त आर.पी. जैन को इसलिए एपीओ कर दिया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद रात्रि 10 बजे बाद उन्होंने न्यू ईयर पार्टी में डैक बजाए जाने की छूट दी थी। किस्सा शुक्रवार 31 दिसंबर की रात्रि होटल जयमहल पैलेस का है। इस होटल में आयोजित न्यू ईयर पार्टी में संभागीय आयुक्त आर.पी. जैन के अलावा कई अन्य वरिष्ठ अफसर भी मौजूद थे।
रात्रि  में 10 बजे बाद डैक बजाए जाने को लेकर जैन की पहले थाना प्रभारी मनोज गुप्ता से कहासुनी हुई। उसके बाद उनकी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के रिश्तेदार एक पुलिस अफसर से भी कहासुनी हुई। सुबह जब यह बात सीएम तक पहुंची तो जैन को तत्काल एपीओ कर दिया गया।
यह भी एक संयोग ही है कि 31 दिसंबर की आधी रात्रि को ही पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हुई है। नए साल की पहली किरण के साथ ही संभागीय आयुक्त आर.पी. जैन को एपीओ कर दिया गया।