Sunday, 25 December 2011

हम भारतीयों के साथ 600 करोड़ का मजाक

यूनिक आईडेंटिटीफिकेशन नंबर योजना को करीब 600 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद संसदीय समिति ने खारिज कर दिया। हम भारतीयों के साथ इस साल का इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है? एक तरफ तो हम पर टैक्स पर टैक्स लादे जा रहे हैं। महंगाई आसमान छू रही है। आम आदमी के लिए परिवार पालना भी मुश्किल हो रहा है। दूसरी तरफ हमारे नेता और अफसर बेमतलब की योजनाओं में इतनी बड़ी रकम बर्बाद कर रहे हैं।
जब यूनिक आईडी योजना शुरू की गई थी तो दावा यह किया गया था कि इससे विभिन्न सरकारी योजनाओं, बैंकों में होने वाले लेन-देन में फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी। हुआ इसका उलटा। बकौल दैनिक भास्कर पूर्वोत्तर राज्यों समेत कई शहरों में बांगलादेशी घुसपैठियों ने राशनकार्ड, वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे प्रमाण-पत्रों के आधार पर यूनिक आईडी कार्ड बनवा लिए हैं। इससे देश की सुरक्षा को खतरा महसूस किया गया। इसी आधार पर संसदीय समिति ने भी इस योजना को खारिज कर दिया।
अब सवाल यह उठता है कि यूनिक आईडी योजना की जरूरत क्यों पड़ी? जबकि इससे पहले मतदाता पहचान-पत्रों को इसी उद्देश्य से बनाया गया था। इसमें मतदाता पहचान पत्र संख्या भी राष्ट्रीय स्तर पर जारी की गई थी। इसमें राष्ट्रीय, राज्य, शहर के कोड के साथ साथ बूथ तक का कोड नंबर दिया गया था। इसी डाटा को क्या ऑनलाइन करके यूनिक आईडी जैसी योजना से नहीं जोड़ा जा सकता था?  मतदाता पहचान पत्र के रिकॉर्ड को ही अपडेट नहीं करवाया जा सकता था? जबकि मतदाता सूची में नाम तभी जुड़ता है जब उपखंड स्तर का अधिकारी मतदाता की ओर से उपलब्ध कराई गई सूचनाओं का सत्यापन करवा लेता है। ऐसे में उसमें कुछ तो फर्जी पहचान पत्र बनने में नियंत्रण था। वैसे भी देश में 85 फीसदी से ज्यादा मतदाता पहचान पत्र बन चुके हैं। हर साल जनवरी में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण अभियान चलता ही है। प्रत्येक मतदाता का रिकॉर्ड ऑनलाइन भी मौजूद है। ऐसे में मतदाता की जानकारियां अपडेट करने में भी सरकार को ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता।
 मगर हमारे अफसरों और नेताओं की सोच तो हमेशा एक ही बिंदू पर काम करती है कि ऐसी क्या योजना बनाएं जिससे कमीशन के तौर पर उन्हें भी कुछ मिल जाए और बजट भी ठिकाने लग जाए। कुछ गड़बड़ हो तो इस देश की जनता को बोलने की आदत ही नहीं है। मसलन अगर भ्रष्टाचार का मुद्दा ही लें तो पूरे देश में शोर मचा हुआ है। प्रमुख समाजसेवी अन्ना हजारे मजबूत लोकपाल बिल की मांग कर रहे हैं। केन्द्र सरकार अपना लोकपाल बिल पास करने पर आमादा है। क्या मतदाता को यह जानने का हक नहीं है कि इस पर कितना पैसा खर्च होगा? मजबूत लोकपाल (चाहे अन्ना का हो या केन्द्र सरकार का ) क्या भ्रष्टाचार को खत्म कर पाएगा। जबकि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून, भारतीय दंड संहिता जैसे कानूनों के साथ मंत्रियों और अफसरों के लिए आचरण नियम, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी),  सीबीआई,  राज्यों में लोकायुक्त जैसी व्यवस्थाएं पहले से ही मौजूद हैं। क्या इनमें से ही किसी एक संस्था को और अधिक मजबूत नहीं बनाया जा सकता। या फिर मजबूत लोकपाल आने के बाद क्या इन सभी व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया जाएगा?

हम किसी कानून में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करते कि कोई सरकार अगर यूनिक आईडी जैसी योजनाएं बनाकर काफी पैसा खर्च होने के बाद उसे बंद या निरस्त करती है तो उसके लिए संबंधित मंत्री, राजनीतिक दल और अफसरों की जवाबदेही तय हो। ऐसी योजना में खर्च हुए धन की भरपाई संबंधित मंत्री-अफसरों की संपत्ति से वसूली करके की जानी चाहिए। जिम्मेदार मंत्री को हमेशा के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाए। अफसरों को सेवा से बर्खास्त करने के साथ ही उस पर जनता के धन की बर्बादी करने का मुकदमा चलाया जाए। इससे भी बढ़कर सरकार नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे, क्योंकि इस तरह के फैसले कैबिनेट की बैठक में ही किए जाते हैं।

Friday, 15 July 2011

आईएएस का हिसाब चुकता, भूल-चूक लेनी-देनी

गहलोत सरकार के पिछले कार्यकाल में की गई एक आईएएस अफसर की विदेश यात्रा को वित्त विभाग ने नियमित तो कर दिया, लेकिन बिना बजट के।  ये आईएएस महोदय यात्रा नियमित होने पर सरकार से यात्रा भत्ते का भुगतान लेने की तैयारी किए बैठे थे। अब पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि चूंकि विदेश यात्रा हो चुकी थी, इसलिए उसका तो कुछ हो नहीं सकता था, लेकिन बजट नहीं देकर सरकार ने आईएएस महोदय के करीब 1.50 से 2.00 लाख रुपए पर पानी फेर दिया। यदि वित्तीय स्वीकृति मिलती तो इतना भुगतान तो उनका बनता ही। यानी हिसाब चुकता, भूल-चूक लेनी देनी। 
हुआ यह कि आईएएस अधिकारी दामोदर शर्मा गहलोत सरकार के पिछले कार्यकाल में बुनकर संघ के अध्यक्ष राधेश्याम तंवर और अन्य अफसरों के साथ फ्रेंकपर्ट की यात्रा करने गए थे। वहीं लगे हाथ दो -तीन और देशों की यात्रा भी कर आए, और यात्रा भी बिजनेस क्लास में की। लौटने पर आईएएस महोदय ने अधिक दिन की यात्रा को नियमित करने की अर्जी दे दी। तत्कालीन सरकार ने उस समय इस यात्रा को नियमित करने से इंकार कर दिया। परन्तु भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री वसुंधराराजे ने जाते-जाते इस यात्रा को नियमित कर दिया। 
आईएएस महोदय को जैसे ही पता चला कि उनकी विदेश यात्रा को मुख्यमंत्री ने नियमित कर दिया है तो उन्होंने तुरंत  बिल पेश कर दिए। उद्योग विभाग में बैठे अधिकारी भी कुछ कम नहीं थे। उन्होंने मामला वित्त विभाग को भेज दिया। वित्त विभाग के अटकाऊटेंटों ने सरकार का हित देखते हुए तुरंत कह दिया कि  यात्रा को कार्मिक विभाग ने नियमित किया है, इसलिए वित्त विभाग भी बिना बजट के यात्रा को नियमित करता है। फाइल की ये नोटिंग सभी जगह से रूटीन में ही अनुमोदित होकर आ गई। आम लोगों के काम अटकाने वालों के काम कभी-कभी अटकते हैं, क्या फर्क पड़ता है।

Sunday, 3 July 2011

विधानसभा का सेक्शन ऑफिसर छाप रहा था नकली नोट

पौने नौ लाख रुपए के नकली नोट बरामद
जयपुर। विधानसभा में सेक्शन आफिसर के पद पर तैनात सुनील सिंह घर पर ही नकली नोट छाप रहा था। सदर थाना ने आरोपी को गिरफ्तार कर नकली नोट छापने की कलर प्रिंटर मशीन व अन्य सामान बरामद कर लिया। आरोपी एसओ ने आठ लाख 91 हजार रुपए के नकली नोट छाप कर चेक बाउंस के मामले में एक व्यक्ति दिए थे। जिसे पुलिस ने जब्त कर लिया है।
सदर एसीपी बजरंग सिंह ने बताया कि गिरफ्तार आरोपी सुनील सिंह(39) न्यू सांगानेर रोड स्थित रामपथ श्याम नगर निवासी है। सुनील सिंह का बैंक कर्मचारी सुरेश कुमार से चेक बाउंस के मामले में न्यायालय में विवाद चल रहा था। शनिवार को सुनील सिंह ने सुरेश कुमार के पास फोन कर समझौता करने के लिए न्यायालय में बुलाया और उसे एक बैग में आठ लाख 91 हजार रुपए तथा एक लाख रुपए का फर्जी चेक दे दिया।

इसके बाद वकील को फीस देने के लिए आरोपी ने रुपए निकाले तो नकली मिले। हजार हजार रुपए के सारे नोट एक ही नंबर के थे। इस पर पीडि़त सदर थाने पहुंच मामला दर्ज कराया। पुलिस ने आरोपी को शनिवार रात को पकड़कर पूछताछ की तो नकली नोट देने की बात कबूल कर ली। पूछताछ में कलर प्रिंटर से स्कैन कर प्रिंट लेकर देने की बात कही। पुलिस ने आरोपी के घर से कलर प्रिंटर बरामद कर लिया है। पूछताछ के लिए चार दिन के रिमांड पर लिया है।
 www.bhaskar.com

Friday, 1 July 2011

आरयूआईडीपी के अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज

               बीसलपुर पेयजल परियोजना में ठेकेदार फर्म एल एंड टी को आपराधिक षड्यंत्र के तहत ढाई करोड़ रुपए से ज्यादा राशि का अधिक भुगतान करने पर  राजस्थान अरबन इन्फ्रास्टक्चर डवलपमेंट प्रोजेक्ट (आरयूआईडीपी) के इंजीनियरों और अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है।
                जिन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, उनमें तत्कालीन मुख्य अभियंता मदनलाल, वरिष्ठ लेखाधिकारी सतीश गोयल, अधीक्षण अभियंता अरुण कुमार जोशी, अधिशासी अभियंता एस.के. सोनी, सहायक अभियंता हुकुमचंद अग्रवाल, कनिष्ठ अभियंता दिनेश गुप्ता, सहायक लेखाधिकारी भरतसिहं, कनिष्ठ लेखाकार सुनील गोयल हैं।
             एल एंड टी कंपनी को इस काम का ठेका वर्ष 2006 में दिया गया था। इन अफसरों ने कंपनी के अधिकारियों से सांठगांठ करके अनुबंध की निर्धारित अवधि में कार्य करने पर अंडेंडम नं. 2 के फार्मूले से भुगतान कर दिया, जबकि यह भुगतान अंडेडम नं. 6 के अनुसार किया जाना था। पॉवर गेलेरी के पॉवरफुल अफसरों का कहना है कि कंपनी से इस राशि की वसूली हो जाएगी। इंजीनियरों का कुछ नहीं बिगड़ेगा। जय- जय राजस्थान।

http://acb.rajasthan.gov.in/


Thursday, 30 June 2011

नर्सिंग कालेज का प्राचार्य चार हजार रूपये रिश्वत लेते गिरफ्तार

जयपुर। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा सोमवार को जनरल नर्सिंग कालेज, एस.के. अस्पताल सीकर के प्राचार्य त्रिलोक चंद त्रिपाठी को चार हजार रूपये कि रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया है। परिवादी, जो कि यहां ए.एन.एम. हैं, ने अपना नाम गोपनीय रखने की शर्त पर परिवाद दर्ज करवाया। परिवादी जो कि जनरल नर्सिंग कालेज में प्रथम वर्ष की छात्रा है। छात्रा ने सीकर ब्यूरो में शिकायत दर्ज करवाई कि प्रथम वर्ष की परीक्षा देने से पूर्व कालेज के प्राचार्य त्रिलोक चंद त्रिपाठी ने उसे परीक्षा में उत्तीर्ण करवाने की एवज में एक रात संबंध बनाने का प्रस्ताव रखा था। परीक्षा में उसके अनुत्तीर्ण हो जाने पर प्राचार्य ने उसे पुनः परीक्षा में पास कराने के लिए पुनः योन संबंध बनाने का प्रस्ताव रखा। परिवादी ने प्राचार्य से कहा कि उसकी और दो साथी भी एक-एक नम्बर से फेल हो गई है, उन्हे भी पास कराना है। प्राचार्य ने दोनो लडकियों से 2000-2000 रूपये रिश्वत लेकर पास करवाने का आश्वासन दिया। अभियुक्त प्राचार्य ने परिवादी को इन दोनो लडकियों द्वारा दी जाने वाली रिश्वत राशि लेकर राणी सती मंदिर तिराहे पर बुलाया। यहां से प्राचार्य इस छात्रा को स्कूटी पर बैठाकर मंदिर के पास एक खाली मकान में ले गया। इन दोनो का पीछा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मूलचंद राणा एवं ब्यूरो टीम सीकर द्वारा किया जा रहा था। टीम द्वारा सूने मकान में प्राचार्य त्रिलोक चंद त्रिपाठी को 4000 रू. रिश्वत लेते हुये तथा ए.एन.एम., नर्सिंग छात्रा से अश्लील हरकते करते हुये धर दबोचा।
उक्त प्रकरण में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अग्रिम कार्यवाही की जा रही है।

असिसटेन्ट प्रोफेसर पांच हजार रूपये रिश्वत लेते गिरफ्तार

जयपुर। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने राकेश शर्मा, असिसटेन्ट प्रोफेसर, साईन्स एंड टेक्नॉलोजी विभाग, वर्धमान महावीर खुला विश्व विद्यालय, कोटा को पांच हजार रूपये की रिश्वत लेते रंगे हाथो शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया गया है। डी.सी.जैन, महानिरीक्षक, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, जयपुर ने बताया कि परिवादी संदीप मालवीय पुत्र ज्ञानेश्वर मालवीय, दादाबाड़ी कोटा का कम्प्यूटर सप्लाई का काम है। संदीप मालवीय ने वर्धमान महावीर खुला विश्व विद्यालय को कम्प्यूटर सप्लाई किये थे, जिसका बिल 1,65,000/- का भुगतान करवाने की एवज में असिसटेन्ट प्रोफेसर द्वारा दस हजार रू. की मांग की।
इस पर परिवादी ने ब्यूरो में शिकायत दर्ज करवाई जिसका सत्यापन सही पाया गया। ब्यूरो टीम कोटा द्वारा अभियुक्त राकेश र्श्मा, असिसटेन्ट प्रोफेसर को पांच हजार रू. की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया है। पांच हजार की रिश्वत राशि अभियुक्त पूर्व में ले चुका था। उक्त प्रकरण में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अग्रिम कार्यवाही की जा रही है।

Saturday, 25 June 2011

और अफसरों की नहीं चल पाई जुगाड़ तकनीक

राजस्थान प्रशासनिक सेवा को छोड़कर अन्य राज्य सेवाओं से आईएएस में चयन को लेकर इस बार सहकारिता विभाग के अफसरों की जुगाड़ तकनीक नहीं चल पाई। अब इन अफसरों ने अदालत की शरण ली है। इनकी वजह से आईएएस में चयन की प्रक्रिया ही फिलहाल रुक गई है। आईएएस के एक पद के लिए करीब 18 प्रत्याशी मैदान में हैं। 
हुआ यह कि सहकारिता विभाग से इस बार रजिस्ट्रार प्रेमसिंह मेहरा ने मैरिट के आधार पर मंजरी भांति, सुरेन्द्रसिंह और एस.के. बाकोलिया के नाम आईएएस के लिए भिजवाए थे। जबकि इनसे पहले जब आईएएस के तीन पद भरे गए थे, तब राजेन्द्र भट्ट, अशोक अय्यर और आर.एस. जाखड़ के नाम भिजवाए गए थे। इनमें जाखड़ आईएएस बन गए। इन लोगों का तर्क है कि आईएएस के लिए जब वे यूपीएसी तक हो आए थे, तो उनका दावा पहला बनता था, लेकिन अब उनके नामों की अभिशंषा नहीं करना उनके साथ अन्याय है। 
पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि भट्ट और अय्यर ने पिछली बार तो जुगाड़ तकनीक अपनाकर अपने नाम आईएएस के लिए विभाग से भिजवा लिए थे। इस बार रजिस्ट्रार ने नाम भेजने से पहले अफसरों की एसीआर, वरिष्ठता को आधार बनाकर मैरिट पर नाम भिजवाए थे। वैसे भी जब आईएएस के लिए नाम भेजे गए थे, तब रजिस्ट्रार छुट्टियों पर थे। अब देखना है कि इस पॉवरफुल पोस्ट के लिए कौन भारी पड़ता है। जय जय राजस्थान।



Friday, 24 June 2011

पीआरओ ने दर्ज कराया अतिरिक्त निदेशक के खिलाफ छुआछूत का मामला

पदोन्नति में आरक्षण मुद्दे से सरकारी कर्मचारियों में पनपी वर्ग- भेद की भावना का असर अब दिखने लगा है। सरकार के कारिंदे अब आरक्षित और अनारक्षित वर्गों में बंट गए हैं। इसी भावना के साथ काम करने लगे हैं। हाल ही  सूचना एवं जन संपर्क महकमे के एक जन संपर्क अधिकारी ने अपने ही विभागीय अतिरिक्त निदेशक के खिलाफ जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करने और गाली-गलौच करने का मामला पुलिस में दर्ज करवा दिया है। 
इसी विभाग में इसी तरह की एक और घटना चर्चा में है। इसमें अल्पसंख्यक वर्ग के एक पत्रकार ने अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले संवाद के एक अधिकारी की शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में कर दी। इन दोनों ही घटनाओं को पदोन्नति में आरक्षण मसले से जोड़कर देखा जा रहा है। इसकी वजह ये है कि अतिरिक्त निदेशक  के खिलाफ मामला दर्ज कराने वाले जनसंपर्क अधिकारी आरक्षण आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। अनुसूचित जाति के जिस अधिकारी के खिलाफ पत्रकार के माध्यम से शिकायत करवाई गई है, उसमें भी संबंधित अधिकारी विभाग के ही कुछ  सामान्य वर्ग से ताल्लुक रखने वाले अधिकारी-कर्मचारियों पर संदेह कर रहे हैं। 
इनके साथ ही कई अन्य विभागों में भी इस तरह की शिकायतें मिल रही हैं कि जहां अनुसूचित जाति के अधिकारी उच्च पदों पर बैठे हैं, वहां सामान्य वर्ग के कनिष्ठ अधिकारी-कर्मचारियों को या तो चार्जशीट थमाई जा रही है अथवा उन पर छोटी-छोटी बातों को लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई है, ताकि आरक्षित वर्ग के लोगों को लाभ पहुंचाया जा सके। 
पॉवर गेलेरी के पॉवर फुल लोगों का मानना  है कि सरकार खुद वर्ग संघर्ष  को बढ़ावा दे रही है। आगे चलकर यह समस्या और भी विकराल हो सकती है। इसलिए सरकार को इस मसले पर जल्द फैसला करने की जरूरत है। 

Tuesday, 14 June 2011

वित्तीय सलाह देना भी भारी पड़ गया

राजस्थान खाद्य आपूर्ति निगम के वित्तीय सलाहकार को फाइल पर क्लिष्ट भाषा में सलाह देना भारी पड़ गया। फाइल की नोटशीट पर वित्तीय सलाहकार ने सलाह में जिस तरह की क्लिष्ट भाषा का इस्तेमाल किया, उसे पढ़कर बड़े अफसर का दिमाग चकरा गया। वे जिस काम को जल्दी करना चाहते थे, वित्तीय सलाहकार की ये सलाह उस काम को अटकाने वाली थी। फाइल पर जो सलाह दी गई थी उसका मजमून कुछ इस प्रकार था "कार्यालय को स्थानांतरित करने के लिए कार्यालय कक्ष के आंतरिक सज्जा और सुविधाओं के परिप्रेक्ष्य में बाह्यय सज्जा के अध्ययधीन उक्त बातों का विश्लेषणात्मक विवेचन करने पर पाया गया कि कार्यालय स्थानांतरित करने का प्रयोगात्मक (एक्सपेरिमेंटल) निर्णय भविष्य में आगे जाकर इस पर किया गया व्यय निरर्थक साबित होगा। "
अफसर तो अफसर हैं, निर्णय लेने में इतनी देर कहां लगाते हैं। सो बडे़ अफसर ने तुरंत फाइल पर वित्तीय सलाहकार को ही नौकरी से हटाने की सलाह दे डाली। दरअसल राजस्थान खाद्य आपूर्ति निगम का कार्यालय अभी राजस्थान स्टेट वेयर हाउसिंग के दफ्तर में चल रहा है। स्टेट वेयर हाउस वाले निगम से दफ्तर खाली करवाना चाहते हैं। इसके लिए लालकोठी स्थित किसान भवन में कार्यालय का स्थान लिया गया है। इस कार्यालय के लिए फर्नीचर, कम्प्यूटर, कुर्सी आदि की खरीद की जानी थी। इसमें सेवानिवृत्ति के बाद संविदा पर रखे गए वित्तीय सलाहकार से इस काम को जल्दी कैसे करवाया जाए, इस बारे में सलाह मांगी गई थी। वित्तीय सलाहकार की सलाह उन्हें ही भारी पड़ गयी। अब पॉवर गैलेरी में चर्चा है कि वित्त विभाग में रहकर सलाहकार अब तक काम अटकाने का ही काम करते रहे थे, सो अब आदत तो धीरे-धीरे ही बदलेगी। इसीलिए तो एकाउटेंट को अटकाउटेंट बोला जाता है। जय- जय राजस्थान।

Wednesday, 8 June 2011

अफसर को लगा एसएमएस का रोग

मोबाइल फोन भी आजकल सुविधा के साथ-साथ बड़ी समस्या बनता जा रहा है। बड़े-बड़े अपराधी मोबाइल की कॉल डिटेल और टावर लोकेशन के आधार पर ही पकड़े जा रहे हैं। राजस्थान में दारासिहं फर्जी मुठभेड़ प्रकरण में भी एनकाउंटर से जुड़े अफसरों की कॉल डिटेल और टावर लोकेशन ने उन्हें फंसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल ही राजस्थान के एक आरएएस अफसर को भी इसी तरह के हालात से रू ब रू होना पड़ा। 
दरअसल दो दिन पहले ही दौसा के एडीएम को राज्य सरकार ने अचानक रात को 10.30 बजे एपीओ (पदस्थापन की प्रतीक्षा में) कर दिया। रात में अनावश्यक एडीएम को एपीओ करने की घटना ने खबरीलाल के कान खड़े कर दिए। पॉवर गेलेरी में इधर-उधर कारण सूंघने का प्रयास किया गया। पॉवर गेलेरी में भी एडीएम को हटाए जाने के कारणों को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी। खबरीलाल को खबर मिली की एडीएम को एपीओ करने की आधिकारिक वजह तो प्रशासनिक ही बताई गई, जो सभी तरह के प्रकरणों में होती है। दौसा की पॉवर गेलेरी की खबर है कि एडीएम महोदय के फोन से किसी महिला मित्र को एसएमएस किए जा रहे थे, किसी गलतफहमी की वजह से ये एसएमएस किसी अन्य महिला के फोन पर पहुंच गए और उसने आलाकमान को शिकायत कर दी। शिकायत पर तुरंत एक्शन हो गया।
बात जब एसएमएस की चली तो एक वरिष्ठ आईएएस भी सतर्क हो गए। विभिन्न कंपनियों की ओर से आए दिन आने वाले अनावश्यक एसएमएस संदेशों को लेकर ये काफी परेशान थे। सो उन्होंने भी अपने पीए को तुरंत आदेश दिए कि उनके मोबाइल पर आने वाले अनावश्यक एसएमएस संदेशों को डीएनडी (डू नॉट डिस्टर्ब) सेवा का उपयोग करके तुरंत बंद कराया जाए।  जय जय राजस्थान ।
 

Sunday, 5 June 2011

अफसरों की पदोन्नति में भी मैसेज की राजनीति

कुछ भी हो राजनेता जनता में मैसेज देने और पब्लिसिटी लेने का मौका कभी नहीं छोड़ते। भले ही सरकारी अफसरों को पदोन्नति देने का मामला ही क्यों न हो ? हाल ही राज्य सरकार ने एक साथ चार अफसरों को अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद पर पदोन्नत किया है। जबकि सरकार के पास अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर की पोस्ट एक ही थी। अब तक होता यह आया है कि जैसे-जैसे पोस्ट खाली होती है तो अफसरों को पदोन्नत कर दिया जाता है, लेकिन सरकार ने अब अफसरों को पदोन्नत करने के साथ ही पोस्ट को अपग्रेड और डिग्रेड करने का फार्मूला अपनाया है। 
खैर हाल ही जो चार अधिकारी अतिरिक्त मुख्य सचिव पद पर पदोन्नत किए गए हैं उनमें दो सामान्य वर्ग और दो अनुसूचित जाति के हैं। पदोन्नति के लिए  तीन ही अफसरों के प्रस्ताव भेजे गए थे। इनमें भी चूंकि जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव रामलुभाया को अतिरिक्त मुख्य सचिव बनाया जाना था, इसलिए वरिष्ठता में उनसे ऊपर आ रहे दो अन्य अधिकारियों ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के प्रमुख सचिव सी.एस. राजन और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव वी.एस. सिंह को भी पदोन्नति मिलनी जरूरी थी। जब मामला मुख्यमंत्री तक गया तो कला एवं संस्कृति प्रेमी आईएएस उमराव सालोदिया का नाम भी यह कहकर पहुंचाया गया कि सालोदिया को पदोन्नति देने से अनुसूचित जाति वर्ग में अच्छा संदेश जाएगा। सो मुख्यमंत्री ने सालोदिया को भी उनके साथ ही पदोन्नत कर दिया। 
पॉवर गेम में दूसरे पायदान पर आने वाले राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की पीड़ा है कि जिस तरह से अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को निर्धारित समय पर पदोन्नति मिलती है, भले ही पोस्ट हो या न हो। उसी तरह से राज्य सेवा के सभी अधिकारियों को भी निर्धारित समय पर पदोन्नति मिलनी ही चाहिए। इससे लिटिगेशन भी कम होगा और सरकार का कर्मचारियों में संदेश भी अच्छा जाएगा। इधर, राज्य कर्मचारियों का भी यही मत है कि जिस तरह से सरकार ने महंगाई भत्ता केन्द्र की घोषणा के साथ ही महंगाई भत्ता मिलने लगा है, उसी तरह टाइम बाउंड पदोन्नतियां भी कर देनी चाहिए। अब देखना है कि कर्मचारी और अधिकारी अपनी पदोन्नति संबंधी मांगों के मनवाने में कहां तक कामयाब होते हैं। जय जय राजस्थान।

Saturday, 4 June 2011

आईएएस बनना है तो जुगाड़ तकनीक अपनाओ

राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से आईएएस बनने का ख्वाब देख रहे हैं। लेकिन उनका ये ख्वाब हकीकत में नहीं बदल पा रहा है। इसकी वजह इनमें सीनियरटी की लड़ाई है। इस लड़ाई का फायदा राज्य सेवा के अन्य अफसर उठा रहे हैं। कुछ तो आईएएस बनकर कलेक्टरी भी कर रहे हैं और आरएएस हैं कि अभी सीनियरटी ही तय नहीं कर पा रहे हैं।
अब फिर राज्य सेवा के तीन अफसरों को आईएएस बनने का मौका मिला है। इसके लिए उन्होंने प्रयास शुरू कर दिए हैं। इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि पूर्व में 25 मई, 2011 रखी गई थी। इस दौरान 28 लोग आवेदन कर चुके थे। जबकि तीन पदों पर नियमानुसार 15 लोगों का ही पैनल बनाया जा सकता था। इसके बावजूद कुछ लोग और रह गए, जो आईएएस बनना चाहते थे। इन्होंने अपने वरिष्ठ साथियों से सलाह मशविरा किया कि वे अब आईएएस के लिए किस तरह पैनल में आ सकते हैं। सो उन्हें एक वरिष्ठ अफसर ने सलाह दी कि  आईएएस बनना है तो जुगाड़ तकनीक अपनाओ। सीधे मुख्य सचिव के पास जाओ और उनसे आग्रह करो कि वे आवेदन की तारीख बढ़वा दें। इन अफसरों को यह तकनीक रास आ गई और आवेदन करने की तारीख बढ़कर 10 जून, 2011 हो गई।
अब कार्मिक विभाग के अफसरों के माथे पर बल पड़े हुए हैं कि 3  पदों के लिए क्या 30 लोगों का पैनल जाएगा। यूपीएससी ने इस पर आपत्ति कर दी तो क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं है कि आरएएस अफसर अपनी ही तरह राज्य सेवा के अन्य अधिकारियों को भी आपस में लड़वाना चाहते हों ताकि ये भी आईएएस नहीं बन पाएं।
जब भी राज्य की अन्य सेवाओं से आईएएस बनते हैं तो आऱएएस सेवा के अफसरों के सीने पर सांप लोटने लगता है। हाल ही एक अफसर की तो टिप्पणी थी कि अगर समय पर उनका प्रमोशन हो जाता तो वे भी आज कम से कम प्रमुख शासन सचिव होते। इस पर एक वरिष्ठ आईएएस अफसर ने उन्हें धीरज बंधाया कि चिंता मत करो, अब सरकार सुपर टाइम स्केल के आरएएस अफसरों को संभागीय आयुक्त लगाएगी। जय जय राजस्थान।

और प्रमुख सचिव ने गुस्से में सेक्शन का फोन ही कटवा दिया

राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग का कम्प्यूटर सेल इन दिनों काफी चर्चा में है। चर्चा की वजह है कम्प्यूटर सेल का टेलीफोन का कट जाना। इस टेलीफोन कटने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। हालांकि आधिकारिक तौर पर तो यही कहा जा रहा है कि कम्प्यूटर सेल के लोग दिनभर विभिन्न अफसरों को फोन पर उनकी आयकर विवरणी, जांच और तबादले आदि के बारे में जानकारी देते रहते थे। इसी से नाराज होकर प्रमुख सचिव ने फोन को ही कटवा दिया।
 खबरीलाल की खबर है कि प्रमुख सचिव अपने विभाग के सभी सेक्शन पर बारीकी से नजर रखते हैं। समय-समय पर वे सेक्शन के लोगों की जानकारी भी लेते रहते हैं। चेक करने के लिहाज से ही उन्होंने कम्प्यूटर सेल में एक दिन दो-तीन बार फोन किया, लेकिन हर बार वहां का फोन व्यस्त आया। इससे नाराज होकर उन्होंने कम्प्यूटर सेल का फोन ही कटवा दिया। इससे पहले भी उन्होंने इसी तरह की एक शिकायत पर इसी सेल के फोन से जीरो डायलिंग सुविधा बंद करवा दी थी। अब कार्मिक विभाग का स्टाफ प्रमुख सचिव के तबादले की कामना कर रहा है, वहीं पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि सरकार प्रमुख सचिव को इससे खराब पोस्टिंग पर भला और कहां लगाएगी। यहां उनके लिए करने को तो कुछ है ही नहीं। सारा तो मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के यहां से होता है।  जय जय राजस्थान। 

Thursday, 26 May 2011

जातीय जनगणना का फायदा आखिर किसे?

देश में जल्दी ही जातीय जनगणना शुरू होने वाली है। इसे लेकर देशभर में एक बहस छिड़ी हुई है। आखिर जातीय जनगणना की जरूरत क्यों है?  इससे फायदा किसे और क्या होगा? मेरे जैसे ज्यादातर लोगों का मानना है कि  कांग्रेस अपने राजनीतिक फायदे के लिए जातीय जनगणना करवा रही है। जातीय वोट बैंक पर कब्जा करने में आसानी को देखते हुए अन्य राजनीतिक दल भी इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं। अधिकांश लोगों का मानना है कि क्या गरीबी और पिछड़ेपन का आधार जाति होगी। अगर जाति होगी तो पिछले 60 साल से आरक्षण दिया जा रहा है, फिर अब तक गरीबी और पिछड़ापन दूर क्यों नहीं हुआ। इस अवधि में गरीबी दूर होने के बजाय अति गरीब (अन्नपूर्णा) की नई श्रेणी बन गई। पिछड़ों में भी अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ साथ विशेष पिछड़ा वर्ग और आर्थिक पिछड़ा वर्ग की नई श्रेणियां बनाई गई हैं। 
जातिवाद का जो जहर इस देश के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण में घोला गया है उसकी कीमत आज हमें ही चुकानी पड़ रही है। जातीय संघर्ष, दंगे-फसाद की घटनाएं आम हो गई हैं। आज भी कई राज्यों में जातिवाद और क्षेत्रीय एवं भाषावाद समस्या बने हुए हैं। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन,  दिल्ली और आसपास के इलाके में जाट आंदोलन, पदोन्नतियों में आरक्षण के खिलाफ सवर्ण वर्ग के कर्मचारियों का आंदोलन आदि को ताजा उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे में जातीय जनगणना कराना क्या उचित है। इसमें भी हाल ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति के अध्यक्ष पी.एल. पूनिया का बयान और भी आग में घी डालने वाला है। उन्होंने कहा है कि अनुसूचित जाति का सदस्य होने का मतलब ही पिछड़ा होना है।
जातीय जनगणना से समस्याएंः   
१. मुझे लगता है कि जातीय जनगणना के बाद हर जाति और वर्ग को देश में उनकी वास्तविक जनसंख्या का ज्ञान हो जाएगा। इसके बाद हर जाति अपनी अपनी मांगों को लेकर आंदोलन में उतर सकती है। वोट बैंक के दवाब में सरकारों को उनकी अनुचित मांगें माननी पड़ सकती हैं। 
२. एक जाति की किसी भी वाजिब या गैरवाजिब मांग का दूसरी जाति विरोध कर सकती है। इससे जातीय संघर्ष की घटनाओं को बढ़ावा मिलेगा। 
३. देश में छुआछूत खत्म होने के बजाय इसमें इजाफा होगा। गरीब और अमीर के कारण एक ही जाति में वर्ग बन सकते हैं और उनमें भी संघर्ष हो सकता है। 
४. राजनीतिक दल जातीय आधार पर ही चुनाव लड़ेंगे, वे अभी भी लड़ते हैं। संभव है कि भविष्य जातिय राजनीतिक दल भी पनप आएं। जिन जातियों की जनसंख्या कम होगी, उन्हें अपना हक प्राप्त करने में ज्यादा परेशानी होगी। 
ये हो सकते हैं समाधानः 
१. पिछड़ेपन का आधार जाति न होकर केवल आर्थिक आधार ही हो। जो लोग कर योग्य आय सीमा (इनकम टैक्स लिमिट) से नीचे हैं, उन्हें पिछड़ा हुआ माना जाए। जो टैक्स भरते हैं, उन्हें सामान्य वर्ग में रखा जाए। वास्तविक पिछड़ेपन का पता लगाने के लिए बिजली, पानी, मोबाइल  के बिल, बैंक खाते आदि की जांच की जा सकती है। 
२. मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए। केवल योग्यता के आधार पर ही नौकरियों में चयन हो। यदि गरीबों अथवा पिछड़ों को विकास की मुख्य धारा में लाना है तो उन्हें केवल शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग दिया जाना चाहिए। जैसे फीस में रियायत दी जा सकती है। किताबें, कोचिंग आदि की व्यवस्था की जा सकती है।  उन्हें अच्छे संस्थानों में प्रवेश दिलाने में सहायता की जा सकती है। 
३. विभिन्न तरह के सरकारी फार्मों, बैंक लोन, आदि में जाति का उल्लेख बंद कर देना चाहिए। केवल नागरिकता ही लिखी जानी चाहिए। पहचान के लिए अब तो यूनिक आईडी नंबर की व्यवस्था की जा रही है। 
४. प्रत्येक पांच वर्ष में इस बात के आंकड़े प्रकाशित किए जाने चाहिए कि सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के कारण कितने लोगों का पिछड़ापन दूर हुआ। यदि पिछड़ों की संख्या बढ़ी तो उसके क्या कारण रहे और उसके लिए जिम्मेदार कौन है। 
५. चुनाव में सभी राजनीतिक दलों के एजेंडे में भी इस बात का उल्लेख होना चाहिए कि वे अपने कार्यकाल में कितने लोगों का पिछड़ापन दूर करेंगे। अथवा सत्ता में रहते हुए कितनों का पिछड़ापन दूर किया और क्या कार्यक्रम लागू किए। 
६. सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों के जातीय संगठनों के कार्यक्रमों में शामिल होने पर रोक लगानी चाहिए।

Sunday, 22 May 2011

प्रमुख शासन सचिव को एमडी ने कराया इंतजार

राज्य सहकारी उपभोक्ता संघ की प्रबंध निदेशक मंजरी भांती ने  राष्ट्रीय सहकारी मसाला मेले के समापन कार्यक्रम में सहकारिता विभाग के प्रमुख सचिव तपेश पंवार को करीब 15 मिनट का इंतजार करवा दिया। पंवार ने एमडी के इस दुस्साहस पर खासी नाराजगी जाहिर की। इसके लिए एमडी को समापन कार्यक्रम में ही सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी। 
हुआ यह कि मेले के समापन समारोह के लिए 21 मई को प्रमुख सचिव को शाम 6.30 बजे का समय दिया गया था। पंवार निर्धारित समय पर कार्यक्रम में पहुंच गए। वहां वे ये देखकर हैरान रह गए कि उस समय तक तो स्टॉल धारकों और अन्य लोगों को दिए जाने वाले प्रमाण पत्र ही तैयार हो रहे थे। जब उन्होंने ज्यादा पड़ताल की तो पता चला कि उपभोक्ता संघ की एमडी खुद कुछ क्षण पहले ही मेला स्थल पर पहुंची थी। उनकी लापरवाही से कार्यक्रम करीब 20 मिनट देरी से शुरू हुआ। तब तक प्रमुख सचिव को वहां मेले में ही इंतजार करना पड़ा। 
पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि मेले के दौरान चार दिन एमडी मंजरी खुद  वीवीआईपी बनी रहीं। जबकि सहकारिता विभाग के अतिरिक्त रजिस्ट्रार तक समय  पर मेले में पहुंचते रहे। मेले के आयोजन को लेकर भी काफी सवाल उठ रहे हैं। चर्चा है कि जब तक इस मेले के आयोजन की जिम्मेदारी सहकारिता विभाग के पास रही तब तक किसी को भी व्यवस्थाओं से कोई शिकायत नहीं रही, लेकिन पिछले तीन साल से जब से उपभोक्ता संघ ने इस आयोजन की जिम्मेदारी संभाली है, तब से मेले में अव्यवस्थाओं का ही बोलबाला ज्यादा रहा है। 
सहकारिता विभाग की पॉवर गेलेरी के रसूखदारों का मानना है कि प्रमुख सचिव तपेश पंवार की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई है। अगले कुछ दिनों में इसकी गाज उपभोक्ता संघ के अधिकारियों पर गिर सकती है। इससे पहले भी उपभोक्ता संघ के एमडी सोमदत्त को एपीओ किया जा चुका है। जय सहकार।

Tuesday, 17 May 2011

पेट्रोल ने लगाई टाटा के सपने में आग

इस देश में आम आदमी की बात तो छोड़िये, सपने देखने का हक शायद टाटा जैसे बड़े लोगों को भी नहीं है। सत्ता में बैठे मठाधीशों और अफसरों ने तय कर लिया है कि इंडिया में कोई भी सपना केवल वही देखेंगे और उसे पूरा करने का हक भी सिर्फ उन्हीं को है। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में 5 रुपए  लीटर की बढ़ोत्तरी करके आम आदमी को फिर से साइकिल और दुपहिया वाहन पर ही चलने की ही हैसियत याद दिलाई है। 
टाटा ने लखटिया कार के रूप में नैनो की कल्पना करके आम आदमी के कार के सपने को पूरा करने की कोशिश की। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने बहुसंख्यक जनता के सपनों को उड़ान दी, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को इसमें टाटा का धंधा ही नजर आया, सो तुरंत पेट्रोल की कीमतें बढ़ा दी। इतना ही नहीं आम आदमी को तो बस में सफर करने लायक भी नहीं छोड़ा जा रहा है, सो अब सरकार डीजल की दरें भी बढ़ाने के प्रयास में है। गैस के दाम बढ़ाकर उसके  निवाले की मात्रा भी कम की जाएगी। मंत्रियों, अफसरों के क्या फर्क पड़ने वाला है, पेट्रोल और डीजल भले ही 500 रुपए लीटर क्यों न हो जाए। उनका खर्च तो सरकारी खजाने से होना है। 
अब समझ नहीं आता कि एक तरफ तो देश में महंगाई तांडव कर रही है। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है । रिजर्व बैंक के गर्वनर से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह तक चिंता व्यक्त कर रहे हैं। दूसरी तरफ पेट्रोल और डीजल पर दाम बढ़ाए जा रहे हैं। इनके दाम बढ़ाने से क्या महंगाई कम हो जाएगी, या भ्रष्टाचार में कमी आएगी ? पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने से महंगाई बढ़ेगी। महंगाई बढ़ेगी तो भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिस अधिकारी अथवा नेता पर घोटाले के आरोप सिद्ध हो जाएं तो उसकी और उसके परिवार की पूरी संपत्ति जब्त करके सरकार के सुपुर्द कर दी जाए। विकास कार्यों में जिन इंजीनियरों, अफसरों की गलती पाई जाए अथवा ठेकेदार कंपनियों की गलतियां मिलें तो उनसे पूरी रकम की ब्याज सहित वसूली हो और भविष्य के लिए उन्हें सभी तरह के सरकारी कामकाज के लिए ब्लैकलिस्टेड कर दिया जाए। 
स्विस बैंक के अधिकारियों ने खुलासा किया है कि उनके बैंकों में इंडिया का 280 लाख करोड़ रुपए जमा हैं। यह पैसा हमारी ही गाढी़ कमाई है, जो टैक्स चोर राजनेताओं और अफसरों ने वहां पर जमा कराया है। इतने पैसे का इस्तेमाल वे अपने जीवन में शायद ही कर पाएं। एक अनुमान के अनुसार 30 साल तक इंडिया को टैक्स रहित बजट दिया जा सकता है। हमारी केन्द्र सरकार को इन टैक्स चोरों के नाम तक बताने में शर्म आ रही है। फिर इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनाने का सपना तो छोड़ ही दीजिए। क्यों नहीं इस पैसे को देश में लाकर आम आदमी के सपने को पूरा करने की कोशिश की जाए। लेकिन कोशिश तो तब होती है, जब कोई जिंदा हो, लेकिन इस देश का आम आदमी तो मरा हुआ है, वह अपने हकों के लिए बोलना और लड़ना तो सीखा ही नहीं है। वे बिरले तो अब इस दुनिया से ही चले गए जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। अब तो इस देश में कुर्बानी देने वालों की नहीं बल्कि कुर्बानी लेने वालों की आबादी बढ़ रही है। जय जवान, जय किसान, जय हिंदुस्तान।


राजस्थान में पुलिस के पीछे पड़ी सीबीआई

राजस्थान में इन दिनों गुजरात जैसा नजारा है। यहां पुलिस के पीछे सीबीआई जो पड़ी है। अब तक अपराधियों को दौड़ाते रहे पुलिस के आला अफसर सीबीआई के डर से अब खुद दौड़ रहे हैं। फर्जी मुठभेड़ के मामले में एक आईपीएस पोन्नूचामी दो दिन की पुलिस कस्टडी में हैं, जबकि एडीजी ए.के. जैन और एडीशनल एसपी अऱशद अली सीबीआई को मिल नहीं रहे हैं। सीबीआई ने इनके लिए अदालत से गिरफ्तारी वारंट भी ले लिया है।
मुद्दा ये नहीं है कि फर्जी मुठभेड़ के मामले में पुलिस के आला अफसर फंसे हैं। मुद्दा ये है कि जब गिरफ्तारी होती है, अथवा खुद पुलिस की पूछताछ और जांच का सामना करना पड़ता है, तब कैसा अनुभव रहता है?  जो एडीशनल एसपी अरशद अली अब गिरफ्तारी के भय से भाग रहे हैं,  उन्हीं के निर्देशन में कुछ साल पहले पुलिस ने जयपुर में ही सात लोगों पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर हत्या जैसा वो जुर्म कबूल करवा लिया था, जो उन्होंने किया ही नहीं था। यानी सात जनों को एक जिंदा महिला की हत्या के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। तब उन निर्दोषों को कैसा लगा होगा?
आईजी स्तर के अधिकारी पोन्नूचामी के वकील ने सीबीआई पर आरोप लगाया कि उन्हें 5 घंटे तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। जबकि पोन्नूचामी खुद जानते हैं कि उन्होंने अपने कैरियर में पूछताछ के नाम पर कितने लोगों को इस तरह से अवैध हिरासत में रखा। उन्हें या तो बाद में छोड़ दिया गया अथवा अदालत का दवाब आने पर गिरफ्तारी दिखाई गई। अभी तो गनीमत है कि आईजी साहब ने सीने में दर्द, कमजोरी और चक्कर आने की शिकायत नहीं की है। अन्यथा बड़े लोगों में वीपी, डायबिटीज, सीने में दर्द, कमजोरी जैसी पुरानी बीमारियां अचानक उखड़ आती हैं।
फर्जी मुठभेड़ मामले में पकड़े गए अन्य पुलिस कर्मियों में से भी एक ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि उन पर राजनेता राजेन्द्र राठौड़ का नाम लेने के लिए दवाब डाला जा रहा है। उन्हें प्रताड़ित किया गया है। क्या पुलिस कर्मियों की इस कहानी पर आम जनता को भरोसा होगा?  जो खुद पुलिस की कार्य प्रणाली से आए दिन गुजरती हैं। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि समय-समय की बात है एक वक्त वो भी था जब एडीजी जैन साहब की पुलिस मुख्यालय से लेकर मंत्रालय, सचिवालय तक तूती बोलती थी। फिलहाल तो आला अफसरों की गिरफ्तारी पर नजर है, क्योंकि राजस्थान के एक आईपीएस मधुकर टंडन आज तक गिरफ्त से बाहर हैं, उन पर अपने ही अर्दली की पत्नी से ज्यादती करने का आरोप है। जय जय राजस्थान।

Sunday, 15 May 2011

आरएएस अफसर को भारी पड़ा पुलिस का पंगा

एक कहावत है कि पुलिस की तो न दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी। गृह विभाग में उप सचिव स्तर के एक आरएएस अफसर को पुलिस वालों से पंगा लेना भारी पड़ा गया। कैरियर के बीच में ही इन महाशय को  भ्रष्ट होने का तमगा लेकर जेल जाना पड़ गया। ऊपर से निलंबित हो गए सो अलग। इस पर भी पुलिस वालों की ज्यादती देखिए कि जेल में भी एक अफसर को यह देखने के लिए भेजा गया कि कहीं आरएएस होने  के कारण अधिकारी को विशेष सुविधाएं तो मुहैया नहीं कराई गई हैं। 
रिश्वत खाने के आरोप में  पकड़े गए एक पुलिस सिपाही से ही रिश्वत लेने के आरोप में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने गृह विभाग के उप सचिव अनिल पालीवाल और उनके  एक क्लर्क को 11 मई को रंगे हाथों पकड़ लिया। तलाशी में उप सचिव के घर से नगर निगम की भी कुछ फाइलें मिलीं, जबकि निगम से उनका तबादला काफी पहले ही हो चुका था। ये फाइलें किसी के भुगतान से संबंधित थीं। 
गृह विभाग के उप सचिव के  घूस खाने के मामले में पकड़े जाने की घटना से पॉवर गेलेरी में खलबली मच गई। इसकी वजह ये नहीं थी कि सचिवालय का कोई अफसर पहली बार इस तरह के मामले में फंसा था। बल्कि वजह ये थी कि आखिर गृहमंत्री शांति धारीवाल के विभागों में ही एसीबी क्यों इतनी तत्परता दिखा रही है। इससे पहले भी नगरीय विकास विभाग में उप सचिव स्तर के ही एक अफसर को भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ा जा चुका था। उनके खिलाफ जांच में क्या मिला, एसीबी ने आज तक इसका खुलासा नहीं किया है। पॉवरफुल लोगों ने मामले की तह में जाने के लिए जासूस दौड़ाए। 
अंदर की जो खबर मिली, उसने पॉवरफुल लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि एक  उप सचिव और वो भी आरएएस की  इतनी हिम्मत की उन लोगों से पंगा ले जो खुद दूसरों को फंसाने और बचाने के लिए रिश्वत खाते हैं। अपराधियों को पकड़े वाली पुलिस को बेअक्ल बताए। जांच-पड़ताल में पता चला कि उप सचिव महोदय ने एसीबी के एक बड़े अफसर की एक्सटेंशन का मामला अटका रखा था। ऊपर से ये कमेंट्स की पुलिस वालों में अक्ल तो होती नहीं है, सिफारिश से काम करवाना चाहते हैं, लेते-देते कुछ है नहीं। चर्चा ये भी कि पालीवाल के पास विधि विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक पद का भी चार्ज था। जबकि सेवानिवृत निदेशक माथुर को सरकार एक महीने पहले ही छह माह का एक्सटेंशन दे चुकी थी, लेकिन उनके भी वे आदेश जारी नहीं कर रहे थे। पिछली सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाए गए माथुर आयोग के उप सचिव का भी कार्यभार था। इससे भी बडा आश्चर्य ये कि इनका तबादला एक माह पहले ही चिकित्सा विभाग में कर दिया गया था, लेकिन ये गृह विभाग में अफसरी का मोह नहीं छोड़ पा रहे थे। ऐसा क्या पता था कि उप सचिव महोदय खुद ही भ्रष्टाचार के मामले में फंस जाएंगे। जय  हो ब्यूरोक्रेसी।

Wednesday, 11 May 2011

आखिर अफसरों पर ही आकर गिरी गाज

मंत्रियों और अफसरों में टकराहट की गाज आखिर फिर अफसरों पर ही आकर गिरी है। मंत्रियों से पटरी नहीं बैठ पाने के कारण जहां सार्वजनिक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. दिनेश गोयल और जेडीए आयुक्त सुधांश पंत को जाना पड़ा है। वहीं  पुलिस के सीआई को जिंदा जलाए जाने की घटना  और लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने के कारण सवाई माधोपुर कलेक्टर रवि सुरपुर को भी खामियाजा भुगतना पडा है। 
पॉवर गैलेरी में चर्चा है कि ई टेंडरिंग को लेकर पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव दिनेश गोयल की मंत्री प्रमोद जैन भाया से पटरी नहीं बैठ रही थी। भाया के तमाम विरोध के बावजूद गोयल ने 50 लाख रुपए के काम पर ही ई टेंडरिंग की व्यवस्था लागू कर दी थी, जबकि पहले यह  व्यवस्था 5 करोड़ रुपए या इससे अधिक  राशि के काम पर ही थी।  जैन और गोयल के टकराव का मामला सीएम तक भी पहुंच गया था। इसी तरह जेडीए आयुक्त सुधांश पंत की भी नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल से पटरी नहीं बैठ पा रही थी। अजमेर रोड पर मुर्गीखाने की जमीन के मामले में सिविल वाद दायर करने को लेकर धारीवाल और पंत की टकराहट जगजाहिर हो गई थी। धारीवाल तभी से पंत को हटाए जाने के लिए अड़े हुए थे। इसी तरह सवाई माधोपुर कलेक्टर रवि सुरपुर को भरतपुर संभागीय आयुक्त राजेश्वरसिंह ने सीआई फूलमोहम्मद को जिंदा जलाए जाने के मामले में लापरवाही का दोषी माना था। यह रिपोर्ट दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री तक पहुंची थी। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि जल्दी ही कुछ और अफसरों पर भी गाज गिर सकती है।

Saturday, 7 May 2011

अन्याय सहन नहीं कर सके आईपीएस, छुट्टी पर गए

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हवासिंह घुमरिया अपने साथ अन्याय सहन नहीं कर सके और 90 दिन की छुट्टी पर चले गए। हुआ यह कि जयपुर में डीसी के पद पर काम कर रहे घुमरिया की पदोन्नति डीआईजी के पद पर हो चुकी थी। वे जयपुर में या तो अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर बनना चाहते थे, अथवा जयपुर के बाहर डीआईजी पद पर लगना चाहते थे। पुलिस महकमे में चर्चा है कि उनसे एसपी का ही काम लिया जा रहा था। जबकि जयपुर में दो डीआईजी को अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर लगाया जा चुका था। समान पद के अधिकारियों से निर्देश मिलने के कारण घुमरिया स्वयं को असहज महसूस कर रहे थे। इसलिए उन्होंने छुट्टियों पर जाना ही बेहतर समझा। उन्हें शायद उम्मीद है कि इस बीच आईपीएस अधिकारियों की तबादला सूची आ सकती है, जिसमें शायद उनके साथ न्याय हो जाए। 

Sunday, 27 February 2011

समारोह में क्षेत्रीय विधायक की अनदेखी, साजिश या गलती

सिविल लाइंस से विधायक प्रतापसिंह खाचरियावास को सत्तापक्ष में असंतुष्ट खेमे में माना जाता है। खुलकर बेबाकी से अपनी बात रखना, उनकी आदत का हिस्सा है। यही आदत 24 फरवरी, 2011 को जयपुर मेट्रो के समारोह में उनकी अनदेखी करने का कारण बन गई।
हुआ यह कि इस दिन मानसरोवर में सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट मेट्रो परियोजना का शिलान्यास कार्यक्रम था। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ, मेट्रोमैन ई, श्रीधरन से लेकर कई नामी-गिरामी हस्तियां वहां आई हुई थीं। इस मेट्रो लाइन का ज्यादातर हिस्सा सिविल लाइंस विधानसभा क्षेत्र से ही गुजरेगा। इस समारोह में औपचारिकता के नाते क्षेत्रीय विधायक खाचरियावास को आमंत्रित तो किया गया, लेकिन वक्ताओं की सूची में उनका नाम ही नहीं रखा।
जब खाचरियावास को इस बात का पता चला तो वे आग बबूला हो गए। मेट्रो जैसे ड्रीम प्रोजेक्ट में क्षेत्रीय विधायक को बोलने नहीं दिया जाए। ये कैसे हो सकता है? उम्मीद के मुताबिक ही हुआ, खाचरियावास ने वहीं विरोध दर्ज कराया और यहां तक कह दिया कि यदि उन्हें नहीं बोलने दिया गया तो वे यहीं मंच पर ही सारा खुलासा कर देंगे। उनकी इस नाराजगी से अफसरों के हाथ पांव फूल गए। वे करते भी क्या, जब तक ऊपर से आज्ञा नहीं हो तो वे अपने स्तर पर विधायक का नाम कैसे जोड़ते। आखिर मामला नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल से होते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक पहुंचा। मौके की नजाकत को भांपते हुए मुख्यमंत्री ने तुरंत वक्ताओं की सूची में खाचरियावास का नाम जोड़ने को कहा गया। नाम जुड़ा तो खाचरियावास खुश। इसके बाद तो उन्होंने मुख्यमंत्री, सरकार और नगरीय विकास मंत्री धारीवाल की तारीफों के जो पुल बांधे, उसका वर्णन इसलिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि खाचरियावास से वैसी उम्मीद किसी को होती ही नहीं है।
खाचरियावास को उस व्यवस्था विरोधी तिकड़ी का हिस्सा माना जाता है जो भ्रष्टाचार, मंत्रियों के नाकारापन, अफसरों की तानाशाही और अन्य मुद्दों को लेकर सदन के अंदर और सदन के बाहर खुलकर अपना विरोध दर्ज करवाती है। पॉवर गेलेरी में अब चर्चा है कि मेट्रो के समारोह में भले ही मामला शांत हो गया हो, लेकिन अंदर की चिंगारी अभी भी सुलग रही है। असंतोष की यह चिंगारी विधानसभा सत्र के पहले और बाद में कभी भी भड़क सकती है। इस चिंगारी को हवा देने के लिए सत्ता के गलियारों में बहुत सारे चेहरे घूम रहे हैं।

Saturday, 26 February 2011

भाजपा में अब दिखी कई चेहरों पर फिर से मुस्कान

भाजपा पार्टी मुख्यालय में करीब एक साल बाद 26 फरवरी को  एक नहीं कई चेहरों पर मुस्कान दिखी। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे की विपक्ष की नेता पद पर ताजपोशी जो हुई थी। हालांकि वे पहले विपक्ष की नेता बनने में ना- नुकर कर रही थीं, लेकिन अंततः इस पद के लिए वे राजी हो ही गईं। कुछ चेहरों पर बनावटी हंसी थी तो कुछ चेहरों पर स्वाभाविक थी। उन्हें अब पॉवर में आने की उम्मीद जो बंधी है। कुछ इसलिए वहां चेहरा दिखाने आए थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि टिकट की उम्मीद तो यहीं से है। कहीं ऐसा न हो कि और नुकसान हो जाए। कुछ कार्यकर्ता इस बात से ही राजी थे कम से कम ठिकाना तो मिला कि अब अगले ढाई -तीन साल किसके मक्खन लगाना है। 
कॉलेज से पुनः हाई स्कूल में लौटने की खुशी में केवल दो चेहरे नहीं दिखे। इनका नहीं दिखना स्वाभाविक भी था और लोगों ने उनकी अनुपस्थिति को उसी रूप में देखा। कटारिया का नंबर कट गया और तिवाड़ी की पॉवर अब कुछ कम हो गई। जो हुआ अच्छा हुआ और आगे जो भी होगा वो अच्छा ही होगा।


 इन सवालों का क्या होगा ?
पॉवर गेलेरी में पिछले कई दिनों से जो सवाल गूंज रहे थे। उनका जवाब अब भी किसी के पास नहीं है। 
पहला- वसुंधराराजे को ही विपक्ष का नेता रखना था तो हटाया क्यों था। राजस्थान में उन्हें हटाने की मांग किसने की थी? 
दूसरा- लोकसभा चुनाव में हार के लिए तीन लोग प्रमुख रूप से दोषी माने गए थे, तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे और संगठन महामंत्री प्रकाशचंद। फिर एक ही जने की पुनः ताजपोशी का फैसला क्यों? 
तीसरा- जब विधायकों की राय से ही विपक्ष का नेता चुना जाना था तो वसुंधराराजे के समर्थन में 50 विधायक पहले भी दिल्ली गए थे। तब क्यों नहीं मानी गई? अब विधायकों की राय जानने का क्या औचित्य? क्या केन्द्रीय नेतृत्व ने येदुरप्पा की तर्ज पर वसुंधरा के दवाब के आगे घुटने टेक दिए हैं ?
चौथा - क्या अब भाजपा में अंदरूनी कलह थम जाएगी। गुटबंदी और धड़ेबाजी तेज नहीं होगी? 

पांचवा - क्या ओमप्रकाश माथुर और संगठन महामंत्री प्रकाशचंद्र की भी पुनः ताजपोशी होगी? 









Monday, 21 February 2011

वसुंधराराजे का नेता प्रतिपक्ष बनना मुश्किल में

वाह, क्या पॉलिटिक्स है?

राजस्थान में इन दिनों अजमेर की दीप दर्शन हाउसिंग सोसायटी का मामला काफी चर्चित है। पिछले दिनों यह मामला विधानसभा में भी गूंजा। इस दौरान कांग्रेसियों ने ही बड़ी होशियारी से सीएम और उनके बेटे को रिकॉर्ड पर ला दिया। हुआ यह कि भाजपा के वासुदेव देवनानी ने सदन में यह मामला उठाया और एक पंपलेटबंटने का जिक्र करते हुए उसके हवाले से सीएम के बेटे का नाम इस प्रकरण में ले दिया। बस क्या था, सीएम विरोधी खेमे के कुछ लोगों को मौका मिल गया। देवनानी पर बेबुनियाद और गलत तथ्यों के आधार पर मामला उठाने का आरोप लगाते हुए पंपलेट को टेबल करवा लिया गया। तब तक आसन पर सभापति विराजमान थे। जैसे ही सीएम और उनके बेटे का नाम आया तो अध्यक्षजी तुरंत दौड़कर आसन पर आए।
अध्यक्ष जी ने आसन पर आने के बाद पंपलेट की जांच तो गृहमंत्री शांति धारीवाल जी को दे दी, और सदन की कार्यवाही से सीएम तथा उनके बेटे का नाम हटाने के निर्देश दे दिए। मतलब  अब अगर पंपलेट छापने के मामले की पुलिस जांच करेगी तो इसकी गहराई में भी जाना पड़ेगा। वजह ये कि अगर पंपलेट छापने वाला व्यक्ति पकड़ में आया तो उससे इस तरह का पंपलेट छापने का आधार तो पूछना ही पड़ेगा। जांच रिपोर्ट भी विधानसभा तक तो आएगी ही।
पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि पॉलिटिक्स भी क्या चीज है। सीएम विरोधी खेमे ने बड़ी होशियारी से एक तीर से कई निशाने साध लिए। नाराजगी भी जाहिर कर दी और सीएम के परिवार को बिना वजह घसीटे जाने का विरोध भी दर्ज करवा दिया।

Thursday, 17 February 2011

नरेगा में चार हजार करोड़ का भ्रष्टाचार हुआ?

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) में इस साल ढाई हजार करोड़ रुपए का ही खर्चा हुआ है। जबकि दो साल पहले इसी योजना में करीब साढ़े छह हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे। अफसर कहते हैं कि नरेगा योजना में सख्ती करने के कारण अब जरूरतमंद लोगों को ही रोजगार मिल रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि  4 हजार करोड़ रुपए की राशि कहां गई। कहीं ऐसा तो नहीं सोशल ऑडिट में जिस तरह से भ्रष्टाचार के मामले सामने आए, ये पैसा भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया हो?
ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहले नरेगा के लिए न तो कोई निर्देशिका थी, न ही किसी तरह की गाइड लाइन। कलेक्टरों की परफोरमेंस भी इसी बात से आंकी जा रही थी कि कौन कितनी लेबर लगाता है। चूंकि नरेगा मांग आधारित योजना है, इसलिए इसे बजट के खर्चे से जोडक़र नहीं देखा जाना चाहिए। अब इसमें थोड़ी सख्ती की है, दिशा निर्देश बनाए हैं और गाइड लाइन जारी की है। वैसे भी अच्छा मानसून होने के कारण नरेगा में रोजगार की मांग में कमी आई है। चूंकि पहले ज्यादा सख्त नियम कायदे नहीं थे, इसीलिए सोशल ऑडिट में भ्रष्टाचार सामने आया था।
आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008-09 में जहां 6175.55 करोड़ रुपए खर्च करके 63.69 लाख परिवारों को रोजगार दिया गया था, वहीं वर्ष 2010-11 में खर्च घटकर 2582 करोड़ रुपए रह गया और रोजगार भी 55.09 परिवारों को ही मिला है। औसत मजदूरी 89 रुपए के बजाय 75 रुपए आ गई है, वहीं 100 दिन पूरे करने वाले परिवारों की संख्या भी 25.94 लाख परिवारों से घटकर 2.1 लाख ही रह गई है। इसके विपरीत जॉब कार्डधारी परिवारों की संख्या बढ़ी है।
किसान मजदूर शक्ति संगठन के निखिल डे का कहना है कि यहां उद्योग मैदान में हुए रोजगार मेले में 2 फरवरी को कई लोगों ने इस तरह की शिकायतें की थीं कि पंचायतों में नरेगा में रोजगार की अर्जी नहीं ली जा रही है। इस पर हालांकि सरकार ने डाकघर और राशन की दुकानों पर भी रोजगार के फार्म उपलब्ध कराए जाने के आदेश निकाले हैं, लेकिन वहां भी रसीद नहीं दी जा रही है। जब तक रोजगार मांगने वाले को रसीद नहीं मिलेगी तब तक उसका बेरोजगारी भत्ते का हक नहीं बनेगा। यह स्थिति तो तब बनी है, जबकि  केन्द्र में ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज विभाग राजस्थान के ही सांसद सी.पी. जोशी के पास था।
अब तक केवल 17 लोगों को बेरोजगारी भत्ता : पूरे राज्य में अब तक केवल डूंगरपुर जिले में 17 लोगों को नरेगा के तहत बेरोजगारी भत्ता दिया गया है। इसे लेने में भी काफी जोर लगाना पड़ा। मजदूर-शक्ति संगठन के अनुसार पंचायतों में जब लोगों को रोजगार आवेदन की रसीद ही नहीं मिलेगी या फार्म ही नहीं लिए जाएंगे तो मजदूर को उसका हक कैसे मिलेगा? जबकि रोजगार की मांग पर आवेदन पत्र लेने के साथ ही रसीद दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
नरेगा में केवल 48 प्रतिशत फंड का ही उपयोग : ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज विभाग के अनुसार नरेगा में अभी तक केवल 48 प्रतिशत फंड का ही उपयोग किया जा सका है। इस फंड में 5373 करोड़ रुपए का बजट है, जबकि इसमें से मात्र 2582.51 करोड़ रुपए का ही खर्चा हुआ है।
महंगाई बढ़ी, मजदूरी घटी :  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि नरेगा का पैसा गांव तक गया तो लोगों की क्रय शक्ति बढ़ गई। इससे महंगाई भी बढ़ी। जबकि हकीकत यह है कि तीन पहले जहां औसत मजदूरी 89 रुपए थी, वहीं अब घटकर 75 रुपए रह गई है। इस पर भी प्रदेश की 3331 पंचायतें ऐसी हैं जहां एक पखवाड़े का, 502 ग्राम पंचायतों में एक महीने का, 42 में डेढ़ महीने और अलवर जिले की 2 पंचायतों मेें दो माह से नरेगा की मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है।
सरकारी पोल खोलते आंकड़े :
विवरण :         2008-9  :     2009-10 :     2010-11 जॉबकार्ड धारी परिवार :     84.68          89.28        92.77 लाख
नियोजित परिवार         63.69 लाख    65.22 लाख    55.09 लाख
कुल मानव दिवस         4829.38     4498.08    2588.05 लाख
100 दिन पूरे करने वाले     25.94 लाख    17.63 लाख    2.1 लाख
औसत रोजगार प्र.परिवार     76 दिन         69 दिन        46 दिन
औसत मजदूरी         89 रु. प्र.दिन    87 रु. प्र.दिन     75 रु. प्रति.
औसत खर्च प्र. ग्रा.पं.     67 लाख रुपए     61 लाख रुपए     28.11 लाख रुपए     

नरेगा में सख्ती करने से गड़बडिय़ां रुकी हैं : भरतसिंह
अच्छे मानसून और रबी की अच्छी पैदावार की वजह से लोगों को दूसरी जगहों पर काम मिला है। निर्माण और अन्य उद्योगों में भी अच्छी मजदूरी मिलने से नरेगा में श्रमिकों की संख्या घटी है। यह मांग आधारित योजना है। काम मांगने पर रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है और इसमें सरकार सफल रही है। मांगने के बावजूद किसी को काम नहीं मिला हो, ऐसे मामले मेरे सामने नहीं आए हैं।
- भरतसिंह, ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री

Sunday, 6 February 2011

इस जांच के पीछे आखिर खेल क्या है?

नगरीय विकास विभाग इन दिनों अजमेर में एक हाउसिंग सोसायटी को जमीन आवंटन के मामले की सेवानिवृत्त आईएएस से जांच करवा रहा है। इस अधिकारी  ने इससे पहले भी दिल्ली के एक ठेकेदार द्वारा आत्महत्या करने के मामले की भी जांच की थी। ठेकेदार ने बकाया बिलों के भुगतान करने के एवज में जेडीए और कोटा यूआईटी के अधिकारियों पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था। ठेकेदार ने आत्महत्या करने से पहले इसकी सीडी भी सरकार को भेजी थी। इस सीडी के बावजूद जेडीए के एक अधिकारी को रिटायरमेंट के ठीक पहले जांच में क्लीनचिट दे दी गई।
अब अजमेर यूआईटी से जुड़ा यह मामला भी चर्चा में है। पॉवर गेलेरी में चर्चा का विषय इसलिए है क्योंकि इसकी गाज जांच से पहले ही दो अफसरों पर गिर चुकी है। प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाने के खेल के पर्चे छपकर बंट चुके हैं और 10 जनपथ तक भी भिजवाए गए हैं। इसमें शिकायत करने वाला व्यक्ति कांग्रेस से जुड़ा है और फायदा लेने वाले जिन लोगों का नाम इस मामले में आ रहा है, वे भी कांग्रेस से जुड़े हैं। फिर इस जांच के पीछे खेल क्या है? पॉवर गेम के माहिर खिलाड़ी इसका पता लगाने में जुटे हैं। इन लोगों के इस मामले में रुचि लेने की वजह यह भी बताई जा रही है कि अजमेर यूआईटी से जुड़े एक अधिकारी को हाल ही सीएमओ में पोस्टिंग मिली है तो एक अधिकारी को एपीओ कर दिया गया, जबकि तीसरे का तबादला कर दिया गया है? 

Wednesday, 2 February 2011

किसी अफसर को फिल्म महंगी पड़ी तो किसी को बिल्डर का साथ

मुख्यमंत्री सचिवालय से राजस्थान प्रशासनिक सेवा के तीन अफसरों की एक साथ विदाई इन दिनों पॉवर गेलेरी में काफी चर्चा का विषय बनी हुई है। आईएएस, आरएएस अफसरों से लेकर सीएमओ और सचिवालय के कर्मचारी तक इस विदाई का रहस्य का पता लगाने में जुटे हैं। पॉवर गेलेरी के पॉवरफुल लोगों का मानना है कि संभवतः ऐसा पहली बार हुआ है जब एक साथ तीन अफसरों को सीएमओ से विदाई दी गई हो। इसके साथ ही इस बात का भी आश्चर्य है कि इनमें से दो अफसरों को यदि सजा के तौर पर हटाया गया तो उन्हें अच्छी पोस्टिंग कैसे दी गई। अच्छी पोस्टिंग मिलने का जवाब किसी को नहीं सूझ रहा है।
पता चला है कि तीनों ही अधिकारी पॉवर गेलेरी के पॉवर गेम का शिकार हो गए। नगरीय विकास विभाग से सीधे सीएमओ में गए अफसर की पुलिस में खुफिया विभाग के ही एक आला अफसर ने रिपोर्ट दे दी कि उन्हें किसी महिला मित्र के साथ सिनेमा हॉल में फिल्म देखते हुए पाया गया। यह  मित्र राजनीति से भी जुड़ी हुई है और संभवतः उसे कोई प्रलोभन दिया गया था। बैक टू पवेलियन यानी परिवहन महकमे में लौटकर आए दूसरे अफसर को उन्हीं के साथियों ने शहर के एक बिल्डर का काम करवाने के लिए उन्हें साथ लेकर सरकारी दफ्तरों में जाते हुए देख लिया। बात दूर तलक चली गई और वे शिकार हो गए। ऊपर तक संदेश यह पहुंचाया गया कि जब सीएमओ का उप सचिव स्तर का अधिकारी ही किसी के साथ सरकारी दफ्तर में जाएगा तो उसका क्या असर होगा?
अब रहे तीसरे अफसर। उनके बारे में बताया गया कि चाचा ने ही भतीजे का शिकार करवा दिया। मामला अजमेर में जमीन से जुड़े एक प्रकरण से संबंधित था। हालांकि यह बात अलग है कि इस प्रकरण की गाज चाचा पर भी गिरी और वे भी मलाईदार पोस्ट से हटा दिए गए। इतना सब कुछ होने पर भी दो अफसरों को मलाईदार पोस्ट मिलने के बारे में बताया जा रहा है कि उन्होंने अपने इमीडियेट बॉस को अच्छी पोस्टिंग के लिए मना लिया था, जबकि तीसरे बॉस को मैनेज नहीं कर पाए।

Wednesday, 26 January 2011

आईएएस को आया गुस्सा, बाबू को रिलीव करके भेजा

नगरीय विकास विभाग में प्रमुख सचिव जी.एस. संधू का गुस्सा पिछले कुछ समय से चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि इस गुस्से की वजह भी विभाग का एक बाबू ही रहा, और उस बाबू को ही भुगतना पड़ गया। हालांकि संधू बहुत ही शांत स्वभाव के हैं, लेकिन इस बार उन्हें लोकायुक्त के यहां पेशी को लेकर गुस्सा आया। हुआ यह कि संधू को एक मामले में लोकायुक्त के यहां पेश होना था, लेकिन वे उस मामले में पहले ही लोकायुक्त कार्यालय में आग्रह करके तारीख बढ़वाने के निर्देश दिए थे। इस संबंध में पत्र भी तैयार हो गया था। उस पर संधू ने हस्ताक्षर भी कर दिए थे, लेकिन यह पत्र लोकायुक्त सचिवालय को भेजा ही नहीं गया था? जब संधू ने पेशी पर जाने के लिए फाइल मांगी तो अधूरी फाइल आई। उसी फाइल में ही वह पत्र मिल गया जिस पर संधू ने हस्ताक्षर किए थे। उस पत्र को देखकर ही संधू को गुस्सा आया और तुरंत संबंधित बाबू को रिलीव कर दिया।
मामला यहीं शांत नहीं हुआ। काम में ढिलाई बरतने और छुट्टियों पर रहने के कारण उप सचिव निष्काम दिवाकर से जेडीए का काम लेकर दूसरे उप सचिव पुरुषोत्तम बियानी को दे दिया। पावर गैलेरी में चर्चा है कि जेडीए का काम देखने वाले नगरीय विकास विभाग के बाबू की लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि उसका अधिकांश समय सचिवालय की कामत केंटीन में पार्टियों के साथ गुजरता था। जेडीए को लेकर और भी कुछ गुल खिलने वाले हैं।

Tuesday, 25 January 2011

पुरस्कृत होने की उम्मीद लगाए बैठे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरा

गणतंत्र दिवस के अवसर पर बुधवार को होने वाले राज्य स्तरीय समारोह में पुरस्कृत होने वाले कई लोगों की उम्मीदों पर इस बार पानी फिर गया। संभवतः ऐसा पहली बार हुआ है  जब मुख्यमंत्री सचिवालय, सामान्य प्रशासन विभाग और कार्मिक विभाग से किसी भी अधिकारी अथवा कर्मचारी का राज्य स्तरीय समारोह में पुरस्कृत करने के लिए चयन नहीं किया गया है। अब तक यह एक परिपाटी सी बनी हुई थी कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस समारोह में हर बार सीएमओ, जीएडी और डीओपी से एक एक अधिकारी अथवा कर्मचारी को सम्मानित किया जाता था।
पुरस्कार के लिए चयन करने में इस बार सामान्य प्रशासन विभाग की प्रमुख सचिव श्रीमती किरन सोनी गुप्ता का स्पष्ट मत था कि केवल उपकृत (किसी को खुश करने के लिए) राज्य स्तरीय समारोह में पुरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए। पुरस्कार केवल उन्हीं को मिलना चाहिए जो वास्तव में इसके लिए हकदार हों।  

Monday, 24 January 2011

सरकार को भारी पड़ सकती सवर्णों की नाराजगी

मौजूदा राज्य सरकार के प्रति सरकारी नौकरियों और पदोन्नतियों में आरक्षण को लेकर अब सवर्ण वर्ग में नाराजगी बढ़ती जा रही है। आने वाले चुनाव में यह नाराजगी कांग्रेस को भारी भी पड़ सकती है। सवर्ण वर्ग के लोगों को लगने  लगा है कि वोटों की राजनीति के खातिर राज्य सरकार न केवल उनके हक छीन रही है, बल्कि हाल ही आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं करके उनके साथ अन्याय भी कर रही है। वोट बैंक के आधार पर अनुसूचित जाति और जनजाति का दबाव का मुकाबला करने के लिए अब सवर्ण जातियां भी लामबंद होने लगी हैं। इसके लिए राजस्थान में बाकायदा मिशन 72 शुरू किया गया है। इस मिशन का उद्देश्य है कि सरकार 28 प्रतिशत लोगों के खातिर 72 प्रतिशत लोगों का गला घोंट रही है। इस मिशन के तहत लोगों को अपने हकों के लिए राजनीतिक रूप से जागृत किया जाने लगा है और वोट के बल पर अपना हक लेने की बात की जा रही है। उन्हें लगने लगा है कि आरक्षण की वजह से उनके लिए नौकरियों और पदोन्नतियों के अवसर अब समाप्त हो रहे हैं। सवर्ण वर्ग के अधिकारी और कर्मचारियों में नाराजगी इस कदर बढ़ चुकी है कि आने वाले चुनावों में इसके परिणाम साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। वर्ष 2003 के चुनाव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को कर्मचारियों की नाराजगी पहले ही भारी पड़ चुकी है। सचिवालय और अन्य सरकारी महकमों में इन दिनों सवर्ण वर्ग के अधिकारी और कर्मचारी आरक्षण से होने वाले नुकसान को लेकर पीड़ा जाहिर करते नजर आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए सवर्ण वर्ग का कहना है कि पदोन्नतियों में आरक्षण समाप्त हो चुका है। सरकार को इस फैसले की पालना में अब तक हुई पदोन्नतियों की समीक्षा करके सवर्ण वर्ग के लोगों को मूल वरीयता (रीगेनिंग) देनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने अवमानना के भय से सभी विभागों की पदोन्नतियां ही रोक दीं। इससे उन सवर्ण अधिकारी और कर्मचारियों को नुकसान हो रहा है जो अगले एक - दो महीने में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इनका तर्क है कि केवल अनुसूचित जाति, जनजाति की पदोन्नतियां ही रुकनी चाहिए थीं। दूसरा तर्क यह भी है कि कमजोर और पिछड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ केवल नौकरी में आने पर ही मिलना चाहिए। नौकरी में आने के बाद आरक्षित वर्ग के अधिकारी, कर्मचारी का पिछड़ापन नहीं रह जाता, बल्कि उसका भी सामाजिक, आर्थिक स्तर ऊपर उठ जाता है। सरकारी सेवा में आ चुके लोगों को आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी और पदोन्नतियों में भी लाभ देना कहां तक उचित है। जबकि दूसरी ओर आरक्षित वर्ग के लोगों का तर्क है कि सरकारी नौकरियों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने का तर्क गलत दिया जा रहा है। वास्तविकता यह है कि उनके पदों पर आज भी बैकलॉग चल रहा है। उनका समाज आज भी सामाजिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। 
आरक्षण को लेकर राजस्थान में एक और आश्चर्यजनक चीज देखने को मिल रही है, वो है लोग आगे बढ़ने के बजाय पिछड़ा होने में ज्यादा सुख अनुभव कर रहे हैं। गुर्जर जहां  अन्य पिछड़ा वर्ग में से अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग कर रहा है, वहीं ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत भी अपने को पिछड़ा हुआ बताकर आरक्षण की मांग कर रहे हैं। गुर्जरों के दबाब को देखते हुए पिछली सरकार ने विशेष पिछड़ा वर्ग की नई श्रेणी बना दी थी, लेकिन इससे मामला शांत होता नजर नहीं आ रहा है। इधर, सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लेकर मुस्लिम समुदाय में भी आरक्षण की मांग का अंकुर फूट रहा है। ये समुदाय भी कभी भी अपनी मांग को लेकर सड़कों पर आ सकता है। राजनीतिक दलों ने जिस आरक्षण को सत्ता में आने का हथियार बनाया, आने वाले दिनों में वही आरक्षण राजनीतिक दलों को सत्ता से बाहर करने का हथियार बनेगा।

Tuesday, 18 January 2011

मंत्री से पंगा लेकर फंस गए जेडीए आयुक्त

जयपुर विकास प्राधिकरण आयुक्त अपने ही मंत्री से पंगा लेकर फंस गए हैं। दीपावली और नव वर्ष के मौके पर जेडीए की ओर से पत्रकारों को कैश कार्ड बांटने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। हालांकि मामले को दबाने के लिए जेडीए आयुक्त ने अपने स्तर पर जांच बिठा दी थी, लेकिन यह मानते हुए कि पूरे मामले में जेडीए आयुक्त की भूमिका संदिग्ध है, इसलिए नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल ने भी अलग से जांच बिठा दी है। उन्होंने यह जांच नगरीय विकास विभाग के प्रमुख सचिव जी.एस. संधू को दी है। धारीवाल का मानना है कि जेडीए से पत्रकारों को कैश कार्ड बिना आयुक्त की मर्जी के बंट जाएं, ये हो ही नहीं सकता। अपने से कनिष्ठ अधिकारी को जांच देकर जेडीए आयुक्त खुद जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।
जेडीए आयुक्त की मंत्री और प्रमुख सचिव से पटरी नहीं बैठने का मामला इससे पहले भी कई मौकों पर जगजाहिर हो चुका है। इससे पहले अजमेर रोड़ पर मुर्गीखाने की जमीन को लेकर भी मंत्री ने जेडीसी के खिलाफ मुख्यमंत्री को पत्र लिख दिया था। उससे पहले जेडीए आयुक्त के विदेश यात्रा पर चले जाने के बाद कुछ जेडीए फाइलें क्लीयर होने के बाद भी जेडीए आयुक्त द्वारा उन पर क्रियान्विति रोकने से मामला ज्यादा बढ़ गया था। पॉवर गैलेरी में अब यह चर्चा आम हो गई है कि जेडीए आयुक्त अब ज्यादा दिन के मेहमान नहीं हैं।

Wednesday, 12 January 2011

....तब तो राजस्थान सरकार को जवाब देना भारी पड़ जाता

पुलिस ने दो दिन पहले मुख्यमंत्री निवास पर आत्मदाह का प्रयास करने के आरोप में कई एनटीटी (नर्सरी ट्रेंड टीचर्स) छात्रों को गिरफ्तार किया। इस घटना ने मुख्यमंत्री निवास की सुरक्षा व्यवस्था और राज्य की इंटेलीजेंस की एक बार फिर पोल खोलकर रख दी। सुरक्षा एजेंसियों और इंटेलीजेंस को इस बात की भनक तक नहीं थी कि इन छात्रों ने सीएम हाउस के अंदर मुख्यमंत्री के सामने आत्मदाह करने की घटना को अंजाम देने की योजना बना ली थी। अगर समय रहते कुछ मीडिया कर्मी सुरक्षा कर्मियों और इंटेलीजेंस के लोगों को सतर्क नहीं करते तो।
दरअसल पुलिस ने जब इन एनटीटी छात्रों की तलाशी ली तो पता चला कि चार-पांच छात्र पेट्रोल से भरी प्लास्टिक थैलियां कपड़ों में छिपाकर सीएम हाउस के  अंदर तक भी ले गए थे। जहां मुख्यमंत्री आम लोगों से मिलकर जन सुनवाई करते हैं, वहां तक एक-एक करके कुछ छात्र पहुंच गए ताकि किसी को शक न हो। उस समय वहां करीब साढ़े तीन हजार की भीड़ थी। मुख्यमंत्री निवास पर सुरक्षाकर्मी केवल मेटल डिटेक्टर उपकरणों से आगंतुकों की जांच करते हैं। इसमें कपड़ों के अंदर छिपाई गई प्लास्टिक की थैलियां पकड़ में नहीं आई। इसलिए उन्होंने इन छात्रों को भी अंदर तक जाने दिया। बाद में जब सीएम हाउस के बाहर इनकी ज्यादा संख्या बढ़ी तो सुरक्षा कर्मियों और पुलिस की नींद उड़ी। अगर ये छात्र अपने मकसद में कामयाब हो जाते तो मौजूदा राज्य सरकार के चेहरे पर कालिख पुत जाती और जवाब देना तक भारी हो जाता।
यह घटना इसलिए और भी गंभीर तथा आश्चर्यजनक हो जाती है, क्योंकि इन्हीं एनटीटी छात्र-छात्राओं के मामले में इंटेलीजेंस पहले भी दो बार फेल हो चुकी है। पहली बार इंटेलीजेंस तब फेल हुई, जब जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शिक्षा संकुल के सामने गार्डन थियेटर का उदघाटन करने गए थे। तब एनटीटी की छात्राएं उनके काफिले के सामने आ गईं और जमकर नारेबाजी की थी। दूसरी बार इन्हीं एनटीटी छात्र-छात्राओं ने प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में जाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सामने प्रदर्शन किया। तब भी इंटेलीजेंस को इनकी योजना की भनक तक नहीं लगी थी। सीएम के मामले में भी इंटेलीजेंस की बार- बार हो रही ऐसी चूक कहीं कभी बड़े हादसे को जन्म न दे पाए, इसकी कामना की जानी चाहिए। दरअसल ये एनटीटी छात्र कई साल से सरकारी नौकरी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। सरकार को भी गौर करना चाहिए कि जब युवा नौकरी के लिए आत्मदाह जैसे खतरनाक कदम उठाने को तैयार हो जाता है तो जरूर उसकी ऐसी मजबूरी रही होगी। इसे दवाब बनाने का प्रयास मात्र न मानकर उनसे वार्ता करके समस्या का समाधान निकाला जाना चाहिए। इससे पहले भाजपाराज में भी 2 सितंबर 2008 को एनटीटी के छात्र-छात्राएं शिक्षा संकुल पर लाठीचार्ज झेलना पड़ा था।

Saturday, 1 January 2011

संभागीय आयुक्त को भारी पड़ा सीएम के रिश्तेदार से उलझना

राज्य सरकार ने 1980 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और जयपुर के संभागीय आयुक्त आर.पी. जैन को इसलिए एपीओ कर दिया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद रात्रि 10 बजे बाद उन्होंने न्यू ईयर पार्टी में डैक बजाए जाने की छूट दी थी। किस्सा शुक्रवार 31 दिसंबर की रात्रि होटल जयमहल पैलेस का है। इस होटल में आयोजित न्यू ईयर पार्टी में संभागीय आयुक्त आर.पी. जैन के अलावा कई अन्य वरिष्ठ अफसर भी मौजूद थे।
रात्रि  में 10 बजे बाद डैक बजाए जाने को लेकर जैन की पहले थाना प्रभारी मनोज गुप्ता से कहासुनी हुई। उसके बाद उनकी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के रिश्तेदार एक पुलिस अफसर से भी कहासुनी हुई। सुबह जब यह बात सीएम तक पहुंची तो जैन को तत्काल एपीओ कर दिया गया।
यह भी एक संयोग ही है कि 31 दिसंबर की आधी रात्रि को ही पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हुई है। नए साल की पहली किरण के साथ ही संभागीय आयुक्त आर.पी. जैन को एपीओ कर दिया गया।