Sunday, 3 October 2010

कौन चाहता है पंचायतराज संस्थाओं में भ्रष्टाचार रोकना

पंचायतराज संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए हाल ही सरकार ने पांच विभाग जिला परिषदों को हस्तांतरित किए हैं। केवल विभाग ही जिला परिषदों को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, प्रारंभिक शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता और कृषि विभागों को फंड, फंक्शन एवं फंक्शनरीज के साथ ट्रांसफर किया है। इतना ही नहीं सरकार ने प्रभावी नियंत्रण के लिए १६ सीसीए जैसे माइनर पेनल्टी के अधिकार भी जिला परिषदों को दिए हैं। जिला परिषदों में आईएएस को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) लगाने की मंशा भी जाहिर की गई है। आरएएस अधिकारियों को अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी (एसीईओ) लगाया गया है। जबकि बाकी विभागों के अधिकारी इनके अधीन काम करेंगे।
राजस्थान पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि पंचायतराज संस्थाओं में खासकर नरेगा को लेकर भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह से सामने आ रहे है, उन्हें रोके जाने की क्या व्यवस्था है? सोशियल ऑडिट का सरपंच और जन प्रतिनिधि ही विरोध कर रहे हैं। अगर किसी अधिकारी या कर्मचारी पर दंडात्मक कार्रवाई करनी है तो उसकी जांच की क्या व्यवस्था होगी? जिला स्तर पर इन विभागों और जिला परिषदों में समन्वय को लेकर भी परेशानी सामने आ सकती है। हो सकता है २० साल की सर्विस वाला डॉक्टर, अथवा आरएएस के समकक्ष योग्यता वाला कोई अफसर उसकी बात ही न सुने। ये भी हो सकता है कि जिला प्रमुख और सीईओ अगर मिल जाएं तो करप्शन रोकने की क्या व्यवस्था होगी। ऐसे में जब सभी विभागों में मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) लगाए गए हैं तो प्रत्येक जिला परिषद स्तर पर एडीशनल एसपी स्तर अथवा एसपी स्तर के अधिकारी को सीवीओ क्यों नहीं लगा दिया जाता। इससे भ्रष्टाचार करने वालों में भी भय रहेगा और योजनाओं में भ्रष्टाचार पर सरकार की निगरानी भी रहेगी।

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