Wednesday, 29 September 2010

धर्मसंकट में हैं राजस्थान के पुलिस महानिदेशक

खाद्य, नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री बाबूलाल नागर के खिलाफ आटा पिसाई, शुद्ध के लिए युद्ध अभियान और पीली मटर दाल के आयात की शिकायत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा को धर्म संकट में डाल दिया है। इस मामले की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो कर रहा है। ब्यूरो की अब तक की पड़ताल में पूरे मामले की जिम्मेदारी खाद्य, नागरिक आपूर्ति विभाग के अफसरों पर आ रही है और पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा के भाई आईएएस ओ.पी. मीणा खाद्य इस विभाग में प्रमुख शासन सचिव हैं। आटा पिसाई से लेकर पीली मटर दाल के आयात करने तक सभी फैसले प्रमुख सचिव स्तर पर हुए हैं। इस मामले में खाद्य राज्यमंत्री बाबूलाल नागर ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है, कि उनका काम तो केवल नीति निर्धारण तक ही है। टेंडर आमंत्रित करना, रेट तय करना, टेंडर खोलना और वर्क ऑर्डर देना सभी काम विभागीय अफसर करते हैं।
खाद्य विभाग के प्रमुख सचिव ओ.पी. मीणा हालांकि इस विभाग से निकलना भी चाहते हैं, लेकिन उनके लिए यहां से निकलना संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में अब पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा का धर्म संकट ये है कि वे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अफसरों के कैसे कहें कि इस मामले में विभागीय प्रमुख सचिव मीणा को बख्शें। इधऱ मंत्री के खिलाफ सबूत और तथ्यों की पड़ताल में जुटी एसीबी को अभी खाद्य विभाग से पूरा रिकॉर्ड तक नहीं मिल पा रहा है। एसीबी की जांच भी अफसरों की जवाबदेही और जिम्मेदारी से आगे नहीं बढ़ रही है। ऐसे में संभावना यही बन रही है कि मामले को गुमनाम शिकायत के नाम पर रफादफा किया जा सकता है।

Monday, 27 September 2010

आईएएस संधू ने अब दिल्ली जाने का इरादा छोड़ा

भारतीय प्रशासनिक सेवा में 1980 बैच के आईएएस अधिकारी गुरुदयालसिंह संधू ने अब प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जाने का इरादा फिलहाल छोड़ दिया है। दो महीने पहले उनका चयन भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव पद के लिए हो गया था। पॉवर गेलेरी की खबर है कि संधू ने अतिरिक्त सचिव का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। इससे पहले वे भारत सरकार में ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर रह चुके हैं। संधू अभी राजस्थान में स्वायत्त शासन, नगरीय विकास एवं आवासन विभाग के प्रमुख शासन सचिव हैं। वे जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के चेयरमैन भी हैं।
संधू के अतिरिक्त सचिव का प्रस्ताव अस्वीकार करने के बारे में पॉवर गेलेरी की खबर है कि जयपुर मेट्रो का प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ड्रीम प्रोजेक्ट है। इसे समयबद्ध तरीके से इसी सरकार के कार्यकाल में पूरा करना है, इसलिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ही संधू जयपुर में ही रुकने के लिए कहा है। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि अब विकास योजनाओं को न केवल गति मिले बल्कि वे निश्चित अवधि में भी पूरी हों।

Sunday, 26 September 2010

राजस्थान में अब सत्ता और संगठन के भी अखबार

राजस्थान में संभवतः यह पहली बार हो रहा होगा जब सत्ताधारी दल में सत्ता और संगठन के शीर्ष नेताओं से जुड़े सिपहसालार एक साथ दैनिक अखबार शुरू कर रहे हैं। खास बात ये कि दोनों ही अखबारों के टाइटल (नाम) भी मिलते-जुलते हैं। मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत के नजदीकी माने जाने वाले श्री शिवचरण माली हालांकि काफी समय से लोकदशा समाचार पत्र का साप्ताहिक प्रकाशन करते रहे हैं। हाल के विधानसभा चुनाव में उन्होंने इस समाचार पत्र के माध्यम से गहलोत की काफी मदद भी की थी। गहलोत के शासन में आते ही लोकदशा को दैनिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित करने की घोषणा कर दी गई। इतना ही नहीं इसके लिए संपादकीय विभाग में नियुक्तियां भी कर ली गई हैं। श्री शिवचरण माली पहले राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में अध्यक्ष पद के दावेदार भी थे, लेकिन बाद में उन्होंने केन्द्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष डॉ। सी.पी. जोशी की खातिर गहलोत के कहने पर नामांकन वापस ले लिया था।
इधर, लोकदशा के प्रकाशन की तैयारियां चल ही रही थीं कि राजस्थान में ही सिरोही के बिल्डर श्री भवानी शंकर शर्मा ने लोक संपर्क नाम से दैनिक समाचार पत्र के प्रकाशन की घोषणा कर दी। इतना ही लोकसंपर्क की वेबसाइट भी लांच कर दी गई है। समाचार पत्र प्रकाशन के लिए संपादकीय विभाग में भर्तियां चल रही हैं। श्री भवानीशंकर शर्मा को केन्द्रीय मंत्री एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ। सी. पी. जोशी का काफी नजदीकी बताया जाता है। शर्मा ने इससे पहले भी मीडिया में आने की कोशिश की थी। अब देखना है कि राजस्थान के विकास और राजनीति में इन समाचार पत्रों की क्या भूमिका रहती है।

Saturday, 25 September 2010

पोस्टिंग लेने से बच रहे हैं आईएएस और आरएएस अफसर

राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी में संभवतः यह पहला मौका है, जब खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग में आईएएस और आरएएस अफसर पोस्टिंग से बच रहे हैं। जो विभाग में लगे हुए हैं उनमें से कुछ लोग यहां से निकल चुके हैं और जो बाकी बचे हैं वे निकलन के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। इसकी वजह केवल एक ही है कि खाद्य, नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री बाबूलाल नागर के साथ पटरी नहीं बैठ पाना। उनके व्यवहार से भी अफसर इस कदर दुखी हैं कि वे इस विभाग में काम करने को कतई राजी नहीं है। हालांकि विभाग के केबिनेट मंत्री खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं, लेकिन वहां तक हर कोई अफसर अपनी बात कह पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

दूसरी वजह यह भी है कि आटा पिसाई, शुद्ध के लिए युद्ध अभियान और पीली मटर की दाल के आयात में भ्रष्टाचार का ठप्पा लग चुका है। नाम भले ही राज्यमंत्री नागर का आ रहा हो, लेकिन रिकॉर्ड के हिसाब से तो अफसर ही फंसते हैं। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच का सामना भी अफसरों को ही करना पड़ रहा है। राज्यमंत्री के व्यवहार के कारण राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी ओ. पी। यादव, उपायुक्त अजय असवाल, गजानंद शर्मा पहले ही यहां से निकल चुके हैं। अब चेतन देवड़ा विभाग में रह गए हैं, जो पूरा कामकाज संभाले हुए हैं। देवड़ा भी यहां से जाने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक अपनी बात पहले ही पहुंचा चुके हैं। विभाग के प्रमुख सचिव ओ. पी. मीणा भी इस पूरे मामले और मंत्री के व्यवहार को लेकर काफी व्यथित हैं। वे पहले ही सीएमओ को यहां से हटने के लिए आग्रह कर चुके हैं। पिछली तबादला सूची में उनका नाम भी था, लेकिन ऐनवक्त पर मीणा और कार्मिक सचिव खेमराज का नाम काट दिया गया। इसकी वजह ये है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद इस पक्ष में नहीं हैं कि खाद्य आपूर्ति जैसे विभाग को एकदम अफसरों से विहीन कर दिया जाए। क्योंकि नया अफसर आने को तैयार नहीं है। अतिरिक्त आयुक्त के पद के लिए पहले जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग में उप सचिव आर.सी. सोलंकी का नाम सुझाया गया था, लेकिन जैसे ही पता चला तो सोलंकी ने जाकर मंत्री को मना कर दिया। उनके बाद अब गृह विभाग में उप सचिव श्रीराम चौरड़िया का नाम चला है, लेकिन वे भी वहां जाने के पक्ष में नहीं है। इस पद के लिए अभी तक किसी भी आरएएस अफसर ने हां नहीं भरी है। इसी तरह पहले यहां सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी गोविंद पारीक को लगाया गया था, लेकिन पारीक ने भी यहां आने से मना कर दिया।

Thursday, 23 September 2010

राजस्थान में आज भी चल रहा है खडाऊ से राज

भगवान श्रीराम के वनवास चले जाने के बाद उनके छोटे भाई भरत ने १४ साल तक अयोध्या में उनकी खडाऊ रखकर ही राज किया था। ठीक वैसे ही राजस्थान में पिछले नौ महीने से मुख्य निर्वाचन अधिकारी का राज चल रहा है। इस पद पर तैनात मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्री विनोद जुत्शी लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद १७ दिसंबर को निर्वाचन आयोग दिल्ली में स्पेशल ड्यूटी पर चले गए थे। इसके बाद १२ जनवरी,२०१० को इसके लिए उनके औपचारिक आदेश भी जारी हो गए। परंतु राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पद का कार्यभार अभी भी उनके पास ही है। इस नाते सचिवालय के मुख्य भवन में तीसरी मंजिल पर बने कक्ष पर उनकी नाम पट्टिका आगंतुकों को आकर्षित कर रही है, लेकिन जब दरवाजा खोलकर देखते हैं तो कुर्सी खाली ही नजर आती है। निर्वाचन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर ही निर्णित होने वाली कोई आवश्यक फाइल होती है तो उसे दिल्ली भेजकर निकलवाना पड़ता है। क्या करें, इस पद का कार्यभार अभी भी जुत्शी के ही पास जो है। पॉवर गेलेरी की खबर है कि इस पद के लिए राज्य सरकार ने पहले जो पैनल भेजा था, उसे निर्वाचन आयोग ने निरस्त कर दिया था। आयोग ने चिकित्सा शिक्षा सचिव मुकेश शर्मा के नाम के साथ तीन अफसरों का दुबारा पैनल मांगा था। यह पैनल भेज दिया गया है, संभवतः जल्दी ही राजस्थान को नया मुख्य निर्वाचन अधिकारी मिल जाएगा।

Wednesday, 22 September 2010

अब चिट्ठियों से भी डरने लगी है राजस्थान पुलिस

गुजरात के सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में राजस्थान के दो-तीन अफसर क्या फंसे अब राजस्थान पुलिस मुठभेड़ और इनकी जांच से जुड़े लोगों के नाम तथा चिट्ठियों से भी डरने लगी है। हाल ही कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर निकली क्वींस बेटन रिले के सिलसिले में खेल एवं युवा मामले विभाग के सचिव आईएएस रोहित कुमार सिहं ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस महकमे को कुछ पत्र लिखे थे। जब ये पत्र पुलिस मुख्यालय में पहुंचे तो पत्र में ऊपर रोहित कुमार सिहं का नाम देखकर एकबारगी तो हलचल मच गई। एक आला अफसर ने तो रोहित कुमार सिहं को कह भी दिया कि आप पत्र लिखने के बजाय फोन पर ही फरमा दिया करो। पत्रों से हम लोग परेशानी महसूस करने लगते हैं। इसकी वजह ये है कि रोहित कुमार सिंह दारासिंह मुठभेड़ मामले की प्रशासनिक जांच में पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े कर चुके हैं। सीबीआई ने इसी रिपोर्ट को जांच का आधार बनाया है। सोहराबुद्दीन, तुलसी प्रजापत के साथ में दारासिहं उर्फ दारिया मुठभेड़ प्रकरण की आंच भी राजस्थान पुलिस तक पहुंच रही है।

गृह मंत्री जी को ये क्या हो गया ?

राज्य के गृह मंत्री शांति धारीवाल इन दिनों अपनी कार्य शैली और स्वभाव को लेकर पावर गैलेरी मे काफी चर्चित हैं। उनके व्यवहार और स्वभाव को लेकर पुलिस महकमे से लेकर सफाई महकमे तक के लोग आश्चर्यचकित हैं। सबसे ज्यादा वे लोग चकित हैं जो पिछले कार्यकाल में भी धारीवाल के साथ काम कर चुके थे। उनके निजी स्टाफ की भी कुछ ऐसी ही शिकायत है। खबरीलाल की खबर है कि धारीवाल के स्वभाव और व्यवहार में बदलाव का मुख्य कारण ८ सिविल लाइंस से पर्याप्त रेस्पांस और कामकाज में फ्री हैंड नहीं मिलना है। खबर है कि धारीवाल खाकी महकमे में कुछ सालेगिरामों को इधर-उधर करने का प्रयास करते हैं। फाइल ८ सिविल लाइंस में जाकर डम्प हो जाती है। यही हाल सफाई महकमे से जुड़े लोगों का है। इसी खीझ को कई बार वे मिलने वाले कार्यकर्ताओं, अफसरों और स्टाफ पर निकाल लेते हैं।

Wednesday, 15 September 2010

तबादला सूचियां 24 तक टलीं

आईएएस, आरएएस और आईपीएस अफसरों की तबादला सूचियां अब 24 सितंबर तक टाल दी गई हैं। इस बीच २४ सितंबर को अयोध्या में राममंदिर मुद्दे पर उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को देखते हुए कानून व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से राज्य पुलिस सेवा के कुछ अफसरों को एक-दो दिन में ही खाली पदों पर पोस्टिंग दी जा सकती है। इनमें कोटा और जोधपुर में एडीशनल एसपी के पदों को तत्काल भरा जाना जरूरी है। जोधपुर के एडीशनल एसपी राजेशसिंह को हाल ही डॉक्टरों की हड़ताल के कारण हटाया गया था।
पावर गैलेरी में चर्चा है कि आईएएस में कई पद खाली पडे़ हैं, जबकि कई अफसरों को दो-दो पदों का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा हुआ है। इसलिए एक और सूची जारी की जा सकती है। आरएएस अफसरों की भी सूची तैयार पड़ी है, इसे भी 24 सितंबर के बाद ही जारी किया जाएगा।
पुलिस महकमे में भी आईपीएस अफसरों की तबादला सूची को लेकर काफी उत्साह बना हुआ है। इसकी वजह यह है कि पिछले महीने 8 पुलिस अधीक्षकों को डीआईजी के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। परन्तु इन्हें अभी तक भी पोस्टिंग नहीं दी गई है। ये अधिकारी डीआईजी बनकर भी एसपी का काम कर रहे हैं। मुखबिर की खबर है कि डीआईजी पद पर पदोन्नत हुए अधिकारी खुद भी एसपी के पद पर ही बने रहना चाहते हैं। इसकी वजह यह है कि अफसरी करने का जो मजा एसपी के पद पर है, वह डीआईजी बनने में कहां? इसलिए पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से पहले ये अधिकारी भी पोस्टिंग नहीं चाहते हैं।

Monday, 13 September 2010

वी.एस. सिंह बन सकते हैं अतिरिक्त मुख्य सचिव

भारतीय प्रशासनिक सेवा में 1978 बैच के अधिकारी श्री वी. एस. सिंह को अतिरिक्त मुख्य सचिव बनाया जा सकता है। सिंह अभी पर्यावरण एवं वन विभाग में प्रमुख सचिव हैं। इसी बैच में अरविंद मायाराम और राजीव महर्षि के नाम भी हैं, परंतु दोनों ही अधिकारी इस समय दिल्ली में पदस्थापित हैं। अतिरिक्त मुख्य सचिव का एक पद हाल ही सलाउद्दीन अहमद के मुख्य सचिव बनने से खाली हुआ है। इस पद के लिए स्क्रीनिंग हो चुकी है।
हालांकि इस पद के लिए 1977 के अधिकारी श्री बी. बी. मोहांति दावेदार हैं। परंतु उनके खिलाफ खेल एवं युवा मामले विभाग में प्रमुख सचिव रहते सवाई मानसिंह स्टेडियम में नियम विरुद्ध डेयरी बूथ आवंटित करने का मामला चल रहा है। इस मामले में राजस्व मंडल के तत्कालीन चेयरमैन श्री राकेश हूजा अपनी रिपोर्ट में अनुशासनात्मक कार्यवाही की सिफारिश करके गए हैं। इस आधार पर कार्मिक विभाग प्रकरण को चार्जशीट की अभिशंसा के साथ मुख्यमंत्री को भिजवा चुका है। कार्मिक विभाग के सूत्रों का कहना है कि पदोन्नति के लिहाज से कमेटी उन्हें पदोन्नति के योग्य मान चुकी है। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विवादों के कारण मोहांति को शायद ही एसीएस बनाएंगे। मोहांति इससे पहले अपने स्टाफ के साथ मारपीट करने को लेकर विवादों में आए थे।

Sunday, 12 September 2010

अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) बनने से खुश नहीं हैं देव

भारतीय प्रशासनिक सेवा में 1977 बैच के अधिकारी पी. के. देव अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह, जेल, नागरिक सुरक्षा और मुख्य सतर्कता अधिकारी बनाए जाने से शायद खुश नहीं हैं। नए पद पर ज्वाइन करने के कुछ दिन बाद वे अवकाश पर चले गए। देव अपनी मित्र मंडली में कह भी चुके हैं कि इस पद के लिए मेरा चयन शायद ठीक नहीं है। इस तरह के पदों पर काम करने का मेरा ज्यादा अनुभव भी नहीं रहा है। वे मानते हैं कि गृह सचिव का पद काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन काम उनकी रुचि का नहीं है। देव इससे पहले राजस्थान रोडवेज के सीएमडी थे। इससे पहले वे दिल्ली में पदस्थापित थे। गैलेरी में चर्चा है कि देव ज्यादा दिन इस पद पर नहीं रहेंगे। संभवत वे दिल्ली जाने की तैयारी में है। पुलिस महकमे और खबरीलालों में चर्चा है कि पहले वाले गृह सचिव से तो नए गृह सचिव ज्यादा अच्छे हैं। पुलिसिया डॉग स्क्वायड भी गलियारों में नए गृह सचिव को तलाशने में जुट गई है।

Saturday, 11 September 2010

सिविल लाइंस का बंगला जिसमें जो रहा,वो गया

खाद्य, नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री बाबूलाल नागर से ज्यादा उनका बंगला इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चित है। इसकी वजह यह कि वे जिस बंगले में रहते हैं, उसमें रहने वाले या तो जबरदस्त विवादों में घिरे और फिर जीतकर भी नहीं आए। नागर इन दिनों खाद्य विभाग में शुद्ध के लिए युद्ध अभियान, पीली मटर की दाल और आटे की पिसाई में भ्रष्टाचार को लेकर विवादों में हैं। वे मंत्री बनने के बाद से ही विवादों में रहे हैं। नागर सिविल लाइंस फाटक के पास वाले जिस बंगले में रहते हैं। उसमें उनसे पहले तत्कालीन स्वायत्त शासन राज्यमंत्री प्रतापसिंह सिंघवी रहते थे। सिंघवी जमीनों की धारा ९० बी को लेकर विवादों में आए। उसके बाद वे तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधराराजे की देवी के रूप में पूजा करके विवादों में आए थे। स्थिति यह बनी कि उनसे स्वायत्त शासन विभाग ही ले लिया गया। उसके बाद वे चुनाव हार गए। इस बंगले में सिंघवी से पहले मौजूदा सांसद महेश जोशी रहते थे। वे गहलोत सरकार में संसदीय सचिव थे और विधानसभा का चुनाव हार गए थे। जोशी से पहले इसी बंगले में मंगलाराम कोली मंत्री के रूप में रहे और चुनाव हार गए। कोली से पहले यह बंगला मौजूदा पर्यटन मंत्री बीना काक के पास रहा था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह बंगला शुभ नहीं है। हो सकता है नागर को भी इसकी कीमत चुकानी पड़े।

Friday, 10 September 2010

राज्यमंत्रियों का टूट रहा है सब्र का बांध

राजस्थान सरकार के राज्यमंत्रियों में धीरे धीरे असंतोष पनप रहा है। इसकी वजह उन्हें केबीनेट मंत्रियों द्वारा काम और अधिकारों का नहीं देना है। अपनी उपेक्षा को लेकर शिक्षा राज्यमंत्री मांगीलाल गरासिया अपने केबीनेट मंत्री मास्टर भंवरलाल मेघवाल का विरोध कर चुके हैं। वे तो इस बारे में मुख्यमंत्री को शिकायत भी दर्ज करवा चुके हैं। तकनीकी शिक्षा राज्यमंत्री मुरारीलाल मीणा,

खेमराज क्यों रह गए और राकेश वर्मा को ऐसी पोस्टिंग क्यों

राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों पिछले सप्ताह जारी की गई तबादला सूची चर्चा का विषय बनी हुई है। पावर गैलेरी में केवल एक ही चर्चा है कि इस सूची में कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव खेमराज का तबादला क्यों नहीं हुआ। सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव राकेश वर्मा को सूचना एवं प्रौद्योगिकी जैसी ठंडी पोस्टिंग क्यों दी गई। दरअसल पहले ही यह तय माना जा रहा था कि प्रमुख गृह सचिव प्रदीप सेन और कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव खेमराज की कार्य प्रणाली से मुख्यमंत्री खुश नहीं थे, इसलिए इनका तबादला तो होना ही था। परन्तु जब लिस्ट आई तो खेमराज का तबादला नहीं होने पर लोगों को आश्चर्य हुआ।
सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव राकेश वर्मा को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नजदीकी माना जाता है, इसलिए लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिलना तय है, लेकिन सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग में पोस्टिंग को देखकर आश्चर्य हुआ। पावर गैलेरी में चर्चा है कि वर्मा ऊर्जा विभाग में प्रमुख सचिव लगना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई सिफारिशें भी करवाईं। इससे नाराज होकर सीएम ने उन्हें सूचना एवं प्रौद्योगिकी जैसे विभाग में पोस्टिंग दी।
खाद्य, नागरिक आपूर्ति विभाग के प्रमुख सचिव ओ.पी. मीणा भी वहां से निकलने के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन उन्हें सीएम ने वहां से हटाना उचित नहीं समझा। ओ.पी. सैनी को डेयरी एवं पशुपालन विभाग से उद्यानिकी में लगाया है। सैनी की पोस्टिंग को भी डेयरी राज्यमंत्री बाबूलाल नागर की नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है। नागर ने सैनी को इस कार्यकाल में जांच के लिए जितने भी पत्र लिखे, सैनी ने उन सभी को फाइल कर दिया और एक का भी जवाब नहीं दिया। प्रमुख गृह सचिव प्रदीप सेन से नाराजगी की वजह उनकी कार्य प्रणाली है। प्रमुख गृह सचिव के रूप में उनकी पुलिस महानिदेशक से बन नहीं रही थी।