Sunday, 29 August 2010

अब सोशल हो रहे हैं राजस्थान के ब्यूरोक्रेट्स

राजस्थान के आईएएस, आरएएस और आईपीएस अफसर शायद सोसायटी से कटाव महसूस कर रहे हैं। इसलिए इन अफसरों ने अब सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा लिया है। ट्विटर और ओरकुट के बाद अब ये अफसर फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर भी दिखने लगे हैं। फेसबुक पर दिखने वाले अधिकारियों में आईएएस रोहित कुमार सिहं, अशोक संपतराम, नीलकमल दरबारी, मुग्धा सिन्हा, किरन सोनी गुप्ता, मधुकर गुप्ता, राजेश यादव, अखिल अरोड़ा, आरएएस अफसरों में अश्विनी कुमार शर्मा, पंकज ओझा, आईपीएस नीनासिंह सहित कई आईपीएस अधिकारी दिखने लगे हैं।

Tuesday, 24 August 2010

कमिश्नरी की लड़ाई में फंसे पुलिस अफसर

राजस्थान पुलिस के आला अफसर इन दिनों प्रदेश की कानून व्यवस्था को छोड़कर पुलिस कमिश्नर बनने की लड़ाई में फंसे हुए हैं। अधिकांश आला अफसर गुटबाजी में फंसे हैं। इनमें कुछ अधिकारी तो एडीजी (अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ) स्तर के अधिकारी को कमिश्नर लगवाना चाहते हैं जबकि दूसरे गुट के लोगों का दबाव है कि आईजी स्तर का अधिकारी कमिश्नर लगे। इसी कलह की वजह से कमिश्नर प्रणाली लागू नहीं हो पा रही है। पहले यह १५ अगस्त से लागू होनी थी। अब भी कमिश्नर प्रणाली का आसानी से लागू हो पाना आसान नहीं लग रहा है। जयपुर में इससे पहले करीब २५ साल पहले भी जयपुर में कमिश्नर प्रणाली लागू करवाने के प्रयास हुए थे। तब इसकी पूरी तैयारी हो गई थीं, कमिश्नर बनने वाले पुलिस अफसरों ने नई वर्दी भी सिलवा ली थी, लेकिन ऐनवक्त पर सरकार ने फैसला रद्द कर दिया। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि पुलिस अफसरों की इसी लड़ाई में इस बार भी कमिश्नरी की खीर फैल सकती है। इसकी वजह यह है कि खुद कमिश्नर बनने के प्रयास में पुलिस अफसर ही एक-दूसरे को निबटाने में लगे हैं। आईपीएस एम.के. देवराजन को जमीन विवाद में लपेटकर पुलिस मुख्यालय से हटाने के पीछे भी यही मंशा बताई जा रही है।

Monday, 23 August 2010

आदेशार्थ- ओवलोकनार्थ

राजस्थान के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग में इन दिनों योग्य अफसरों की तलाश है। विभाग में कार्यरत राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों से विभागीय आयुक्त प्रेमसिंह मेहरा एवं उच्चायुक्त संतुष्ट नहीं हैं। उनके कामकाज की शैली और काम टालू प्रवृत्ति से कमिश्नर परेशान हैं। पॉवर गेलेरी में सहयोगी अफसरों से चर्चा में कमिश्नर ने कहा कि ये अफसर फाइल पर आदेशार्थ और अवलोकनार्थ के आगे कुछ लिखते ही नहीं हैं। ऐसे में कोई निर्णय लें भी तो कैसे। वे कहते हैं कि या तो इन जैसे आरएएस अफसर कुछ और यहां लगा देने चाहिए अथवा इनकी जगह योग्य अफसर दिए जाने चाहिए। इससे कम से कम काम तो समय पर होगा।