Saturday, 2 January 2010

सरकार आखिर कितना टैक्स लगाएगी

अगले महीने ही केन्द्र और राज्य सरकारों के बजट आने वाले हैं। आर्थिक तंगी और मंदी से जूझ रहे आम आदमी का बजट के नाम से ही तनाव बढ़ जाता है। बजट मतलब आम जरूरत की चीजों के दामों में बढ़ोत्तरी, नए-नए टैक्स, सरचार्ज, सैस आदि का भार। यानी विकास कार्यों के नाम पर जन प्रतिनिधियों और अफसरों के एशो-आराम और मोटे-मोटे खर्चों का इंतजाम। हालत यह हो गई है कि मध्यम वर्गीय परिवार यानी आप हम कमाई पर इनकम टैक्स दे रहे हैं और खर्चा करने में भी वैट तथा सर्विस टैक्स देना पड़ रहा है। बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी स्कूलों में मोटी फीस चुकाने के बाद भी मोबाइल, टेलीफोन सहित कई तरह के बिलों में दो-दो एज्यूकेशन सैस देने पड़ रहे हैं। सड़क पर चलने की कितनी बड़ी कीमत वसूली जा रही है शायद इसका अंदाजा भी हमें नहीं है। वाहन की खरीद पर परिवहन विभाग रोड़ टैक्स लेता है। वाणिज्यिक कर विभाग वैट और पंजीयन एवं मुद्रांक कर विभाग स्टाम्प ड्यूटी ले रहा है। इस पर भी केन्द्र सरकार सड़कों की मरम्मत के नाम पर दो रुपए लीटर रोड़ सैस, राजस्थान सरकार पचास पैसे प्रति लीटर रोड सैस ले रही है। हाईवे पर हमें टोल टैक्स चुकाना पड़ रहा है। यानी एक सड़क के लिए तीन टैक्स देने पड़ रहे हैं। इस पर भी शहरों में चुंनिंदा इलाकों को छोड़कर सड़कों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। अब फिर टैक्स और सैस लगाने की तैयारी की जा रही हैं और हम चुपचाप यह सब सहन कर रहे हैं। आखिर सरकार लोगों को बेहतर सुविधाएं देकर आर्थिक संसाधन क्यों नहीं जुटानी चाहती।