Wednesday, 22 December 2010

अब सरकारी महकमों में पदावनति का दौर शुरू

सरकारी महकमों में अब पदावनित का दौर भी शुरू हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अवमानना के डर से आबकारी विभाग में सरकार चार अफसरों का पदोन्नति आदेश वापस लिया जा चुका है। कार्मिक विभाग के निर्देश पर बुधवार को शिक्षा विभाग ने भी कई व्याख्याताओं को पदावनत कर दिया है। राज्य प्रशासनिक सेवा में भी कुछ अधिकारियों को तदर्थ रूप से दी गई पदोन्नति वापस लेने की तैयारी की जा रही है। इसका असर अन्य सेवाओं पर भी पड़ेगा। हालांकि आरएएस अफसर पूरा जोर लगाए हुए हैं कि उनकी पदोन्नति वापस नहीं हो, क्योंकि इनमें से एक दो लोग सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
पदोन्नतियों में आरक्षण को लेकर सरकार के सामने उलझन भरी स्थिति है। सामान्य वर्ग भी जहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए दबाब बना रहे हैं। वहीं आरक्षित वर्ग के लोगों का कहना है कि नौकरियों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, अनेक पदों पर बैकलॉग बना हुआ है, इसलिए पदोन्नतियों में उनका आरक्षण जारी रखा जाए।  हालांकि सरकार मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी बनाकर इसका कोई रास्ता निकालने के प्रयास में है। 

Sunday, 19 December 2010

पुलिस के आला अफसर चाहते हैं कमिश्नर प्रणाली टल जाए

 जयपुर और जोधपुर में पहला कमिश्नर बनने के लिए यूं तो पुलिस के आला अफसरों में जंग मची है। बड़े-बड़े पदों पर बैठे पुलिस अफसर अपनी-अपनी लॉबिंग में लगे हैं। परन्तु मलमास ने इन अफसरों की धड़कने बढ़ा दी हैं। अब ये अफसर कोशिशों में लगे हैं कि किसी भी तरह पुलिस कमिश्नर प्रणाली जनवरी तक टल जाए। सरकार ने अगर इससे पहले लागू कर दिया तो मलमास में ही ज्वाइन करना पड़ेगा, जो शुभ नहीं रहेगा।
राज्य सरकार जयपुर और जोधपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की तैयारियां पूरी कर चुकी हैं। कुछ नोटिफिकेशन हो चुके हैं, जबकि मुख्य नोटिफिकेशन होना बाकी है। पता नहीं सरकार कब कमिश्नर प्रणाली लागू कर दे, इस उम्मीद में कुछ पुलिस अफसरों ने तो नई वर्दी भी तैयार करवा ली है, जबकि कुछ अफसर ज्वाइनिंग का मुहूर्त दिखवाने में लगे हैं।
एडीजी और आईजी को लेकर है कवायदः  सरकार में फिलहाल कवायद यह चल रही है कि कहां किस स्तर के अधिकारी को कमिश्नर लगाया जाए। मोटे तौर पर जयपुर में एडीजी स्तर के अधिकारी को ही कमिश्नर लगाए जाने की संभावना ज्यादा है। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि दिल्ली में डीजी स्तर का अधिकारी कमिश्नर है अन्य शहरों में भी कमोबेश इसी स्तर के अफसर कमिश्नर हैं। जयपुर वैसे भी बड़ा शहर होने के साथ साथ राज्य की राजधानी भी है। गृहमंत्री शांति धारीवाल भी एडीजी स्तर के अधिकारी को ही जयपुर का कमिश्नर बनाए जाने के पक्ष में हैं। जबकि जोधपुर में आईजी स्तर के अधिकारी को ही कमिश्नर बनाया जाना तय है। इसके पीछे भी तर्क यही है कि जोधपुर अभी छोटा शहर है। पहले आईजी रेंज का अधिकारी कमिश्नर लगे, बाद में जरूरत दिखे तो पद को अपग्रेड किया जा सकता है। इस संबंध में कुछ लोग चाहते हैं कि जोधपुर मुख्यमंत्री का गृह जिला है, इसलिए वहां भी एडीजी स्तर का ही अधिकारी कमिश्नर बनाया जाना चाहिए।  इस बारे में फैसला मुख्यमंत्री के स्तर पर होना है।

Saturday, 18 December 2010

महिला आरएएस अफसर को धमका रहे हैं केन्द्रीय मंत्री और डीजीपी

राजस्थान प्रशासनिक सेवा की अधिकारी गीतासिंहदेव को केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा, पुलिस महानिदेशक हरिश्चंद्र मीणा, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ओ.पी. मीणा से धमकियां मिल रही हैं। गीतासिंहदेव की नींद उड़ी हुई है। मानसिक तनाव की वजह से वे सरकारी काम भी सही से नहीं कर पा रही हैं। इस सबके बावजूद पुलिस में उनकी एफआईआर तक दर्ज नहीं हो रही है। इसके लिए वे एसपी से लेकर गृहमंत्री शांति धारीवाल तक गुहार लगा चुकी हैं। शिकायती पत्र पर क्या कार्रवाई हुई यह जानने के लिए भी उन्हें सूचना के अधिकार कानून का सहारा लेना पडा है।
बकौल गीतासिंह उनकी शादी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ओ.पी. मीणा से हुई थी। मीणा अभी खाद्य, नागरिक आपूर्ति विभाग में प्रमुख सचिव और केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा, डीजीपी हरिश्चंद्र मीणा के भाई हैं। गीतासिंह का आरोप है कि पुत्र न होने की वजह से उन्हें लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। आए दिन उनसे मारपीट की जाती है और घर से बाहर निकाल दिया जाता है। गत 15 नवंबर को भी उनके साथ मारपीट की गई, जिससे हाथ में फ्रेक्चर आ गया। जब वे बनीपार्क थाने पर रिपोर्ट दर्ज कराने गई तो रिपोर्ट नहीं लिखी गई बल्कि सिपाही भेजकर उन्हें घर में रखवा दिया। बकौल गीतासिंह इस तरह की प्रताड़ना का यह सिलसिला उनके पिता जी. रामचंद्र के समय से ही चला आ रहा है। उनके पिता जी. रामचंद्र ने पहले भी तत्कालीन मुख्य सचिव अरुण कुमार नायर से कहकर इस मामले में हस्तक्षेप करवाया था।
गीतासिंह का आरोप है कि केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा, डीजीपी हरिश्चंद्र मीणा ने उन्हें फोन करके धमकाया कि कहीं भी शिकायत कर ले, कुछ नहीं होने वाला। सीएम क्या पीएम से भी मिल लो तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। इसी वजह से उनकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं हो रही है। इधर, गीतासिंह की शिकायत वाली फाइल को डीजीपी हरिश्चंद्र मीणा ने गृह विभाग को यह कहकर लौटा दिया है कि इसकी जांच किसी दूसरी एजेंसी से करवाई जानी चाहिए।

Tuesday, 16 November 2010

गर्ग और दक बनेंगे पुलिस कमिश्नर

राजस्थान में पुलिस कमिश्नरी को लेकर पुलिस महकमे में काफी उत्सुकता है। कमिश्नर प्रणाली संभवतः दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक राजधानी जयपुर के साथ साथ जोधपुर में भी लागू होनी है। पहला कमिश्नर बनने के लिए पुलिस अफसरों की भागमभाग अभी भी जारी है।
पॉवर गेलेरी की खबरों के अनुसार भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के एडीजी अजीतसिंह इस दौड़ से बाहर हो गए हैं। खबर है कि जोधपुर में आईपीएस अधिकारी श्री भूपेन्द्रसिंह दक और जयपुर में एडीजी इंटेलीजेंस कपिल गर्ग को कमिश्नर बनाया जाना लगभग तय है। कपिल गर्ग को कमिश्नरी के रूप में अजमेर बम ब्लास्ट मामले में आरएसएस प्रचारक इंद्रेश कुमार और अन्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ सबूत जुटाने का इनाम दिया जा सकता है। इसलिए माना जा रहा है कि गर्ग को ही कमिश्नर बनाया जाएगा। इधर, गृह विभाग ने कमिश्नरी लागू करने की सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। सभी तरह के नोटिफिकेशन का प्रारूप तैयार कर लिया गया है। यहां तक कि स्टाफ की नियुक्ति के लिए वित्त विभाग की मंजूरी भी ली जा चुकी है। कुछ एक बिंदु पर अभी विधि विभाग के साथ डिस्कसन चल रहा है।

Monday, 25 October 2010

दिल्ली में जगह तलाश रहे हैं राजस्थान के डीजीपी

राजस्थान के पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा ने अब अपने लिए दिल्ली में पोस्ट तलाशनी शुरू कर दी है। इसकी वजह, पिछले दिनों कलेक्टर-कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और गृहमंत्री शांति धारीवाल से मिला फेल्योर पुलिस सिस्टम का सर्टिफिकेट है। पॉवर गेलेरी में इस सर्टिफिकेट की इन दिनों खूब चर्चा है। दरअसल कानून व्यवस्था पर समीक्षा के दौरान जब पुलिस महानिदेशक ने वर्ष 1999 से तुलना करते हुए राज्य में गंभीर अपराध घटने का दावा किया, तो मुख्यमंत्री नाराज हो गए। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पुलिस की विफलताएं गिनानी शुरू कीं। उन्होंने कहा कि थाने के अंदर महिला सिपाही की बलात्कार के बाद हत्या हो जाए, ऐसा राजस्थान में पहले कभी हुआ है। पुलिस कंट्रोल रूम के सामने अपराधी नरमुंड काटकर डाल जाएं और पुलिस कुछ नहीं कर पाए, ऐसा आज से पहले कभी राजस्थान में हुआ है? फरार चल रहे डीआईजी स्तर के अधिकारी को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाए, इससे ज्यादा शर्म की बात पुलिस के लिए हो सकती है? झालावाड़ के मनोहरथाना में आदिवासी युवती को उठाकर ले जाएं और बलात्कार होने के बाद गिरफ्तारी को लेकर हिंसक घटना हो जाए, क्या ये गंभीर बात नहीं हैं। क्या पुलिसिंग व्यवस्था है। अपराधियों में कही पुलिस का डर है? आप आंकड़े किसे बता रहे हैं?
इसी तरह गृहमंत्री शांति धारीवाल ने तो पुलिस की इंटेलीजेंस पर यह कहकर सवालिया निशान लगा दिया कि जवाहर लाल नेहरू मार्ग पर एक कार्यक्रम में छात्राएं मुख्यमंत्री के सामने आकर प्रदर्शन कर जाएं, और पुलिस को इसकी भनक ही नहीं लगे, इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है। उन्होंने कहा कि इंटेलीजेंस कम्पलीट फेल्योर है। एसपी थानों का निरीक्षण नहीं करते। थानों में जनता की सुनवाई नहीं होती है। थाने भूमाफियाओं की शरणस्थली और प्रॉपर्टी डीलरों के दफ्तर बनकर रह गए हैं।
पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि इस तरह सार्वजनिक तौर पर अपमानित होने के बाद अब पुलिस महानिदेशक यहां से निकलने के मूड में हैं। इसके साथ ही डीजीपी की दौड़ में जुटे अफसरों ने जुगत बिठाना शुरू कर दिया है।

Wednesday, 20 October 2010

सरकार ने फेरा वर्ल्ड क्लास अरमानों पर पानी

राज्य सरकार की ओर से मंगलवार को जारी की गई तबादला सूची के बाद राजस्थान की पॉवर गेलेरी में कई रोचक किस्से चटखारे लेकर सुनाए जा रहे हैं। इस सूची में कई लोगों के अरमानों पर पानी फिरा, तो कुछ की लॉटरी  लग गई। इस फेरबदल में सबसे ज्यादा चोट तो आयोजना विभाग के राज्यमंत्री राजेन्द्र गुढ़ा के साथ हुई। गुढ़ा को हालांकि पर्यटन विभाग का भी राज्यमंत्री बनाया हुआ है, लेकिन इस विभाग में उनके लिए कोई काम नहीं है। उन्हें स्वतंत्र प्रभार देने के लिए पहले तो कई माह बाद आयोजना (जनशक्ति) विभाग बनाया गया। इसमें कई दिनों तक स्टाफ, डायरेक्टर ही नहीं लगा। पिछली तबादला सूची में वरिष्ठ आरएएस अधिकारी श्रीराम मीणा को निदेशक लगाया गया था। मीणा ने बैठने के लिए जैसे तैसे कमरे का जुगाड़ किया तो इस लिस्ट में उन्हें सिरोही का कलेक्टर लगा दिया गया। अब आयोजना जनशक्ति विभाग में निदेशक का पद फिर खाली हो गया है। इनके साथ ही दो और आरएएस अधिकारियों को धौलपुर और प्रतापगढ़ का कलेक्टर लगा दिया गया है। इसके विपरीत दौसा में कलेक्टर रह चुके एल.सी. असवाल ने जयपुर  नगर निगम में बड़े उत्साह से काम शुरू किया था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मिड डे मील कार्यक्रम का निदेशक बनाकर उनके वर्ल्ड क्लास अरमानों पर पानी फेर दिया। वैसे नगर निगम के कई अधिकारी और कर्मचारियों के मन में असवाल के तबादले से दीपावली के पटाखे अभी से फूट रहे हैं।
आरएएस अधिकारियों में जूनियर को बॉस बनाने से खफा चल रहे चेतन देवड़ा को इस सूची में भी राहत नहीं मिली है। उन्हें खाद्य नागरिक आपूर्ति विभाग से हटाया नहीं गया है। जबकि गृह विभाग के उप सचिव श्रीराम चौरड़िया को फिलहाल कुछ माह तक यहीं टिककर काम करने की सलाह दी गई है।
पत्रकार और कांग्रेस कार्यकर्ता से पंगा लेना नई नई आईएएस टीना सोनी को आखिर भारी पड़ गया। उन्हें माउंटआबू के एसडीएम पद से हटा दिया  गया। झालावाड़ के मनोहर थाना में आदिवासी युवती से बलात्कार की घटना के बाद हिंसा वहां के कलेक्टर पी. रमेश को भारी पड़ी। कलेक्टर कांफ्रेंस में ही मुख्यमंत्री के रुख से संकेत मिल चुके थे कि कलेक्टर एसपी पर गाज गिरने वाली है। इसी तरह का खामियाजा धौलपुर कलेक्टर वी. सरवन कुमार को भुगतना पड़ा। वहां एसपी सुरेन्द्र कुमार पर डकैतों से मिलीभगत के आरोप कलेक्टर कांफ्रेंस में लगे तो कलेक्टर को भी जाना पड़ा। वैसे भी बताया जा रहा है कि कलेक्टर और एसपी में छत्तीस का आंकड़ा था।
अब पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि जल्दी ही आईपीएस अफसरों की तबादला सूची और जारी होगी। इसमें कोटा, झालावाड़, धौलपुर, दौसा, प्रतापगढ़ जिलों के एसपी के साथ ही आईजी, डीआईजी स्तर के अधिकारियों पर राज की गाज गिर सकती है।

Thursday, 14 October 2010

वाणिज्यिक कर विभाग से हट सकते हैं दो तीन आरएएस अफसर

वाणिज्यिक कर विभाग में 9 आरएएस अफसरों को लगाए जाने से वाणिज्यिकर सेवा के अधिकारियों का विरोध अब सफल होता नजर आ रहा है। संभवतः सरकार आने वाली आरएएस अफसरों की तबादला सूची में वाणिज्यिक कर विभाग से 2- 3 अफसरों को वापस बुला लेगी। वाणिज्यिक कर सेवा के अधिकारी कुछ पदों पर हाईकोर्ट के फैसले की दलील देकर अपना दावा कर रहे हैं। इस बीच विभाग में अतिरिक्त आयुक्त के पद पर तैनात 1985  बैच के अधिकारी वेदप्रकाश भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। विभागीय गेलेरी में चर्चा है कि वेदप्रकाश यहां लंबे समय से जमे हैं। पहले वे उपायुक्त प्रशासन के पद पर आए थे, अब उन्हें अतिरिक्त आयुक्त बना दिया गया है। संभवतः विभाग में वही सबसे पुराने आरएएस अधिकारी हैं। वेदप्रकाश चर्चा में इसलिए भी हैं क्योंकि वे जो जैसा चल रहा है, उसे चलने दो में विश्वास रखते हैं। साफ सुथरी, स्वच्छ और साधारण जीवन शैली की छवि वाले वेदप्रकाश के बारे में चर्चा है कि नवीनता में उनका विश्वास कम है और वे लकीर के फकीर बने रहने में ही ज्यादा विश्वास करते हैं।

राजस्थान रोडवेज में छुट्टी मंजूर करने पर बबाल

राजस्थान रोडवेज में पिछले दिनों बोर्ड के सचिव की छुट्टी मंजूर करने को लेकर ऐसा बवाल मचा कि आज तक चर्चा में है। हुआ यह कि बोर्ड के सचिव को अवकाश पर जाना था, सो उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया से अपना आवेदन भिजवा दिया। सामान्य प्रक्रिया में उनकी छुट्टी रोडवेज के एमडी डॉ. मंजीतसिंह ने मंजूर कर दी। चेयरमैन प्रदीपसेन को जब पता चला कि उनके सचिव की छुट्टी उनसे पूछे बिना ही मंजूर कर दी गई है, तो वे नाराज हो गए। नाराज भी इस कदर हुए कि बाकायदा पत्र लिखकर पूछ लिया कि बोर्ड के सचिव की छुट्टी मंजूर करने की शक्तियां किसके पास हैं। मामला यहां तक बढ़ा कि रोडवेज के रूल्स ऑफ बिजनेस तक दिखवाए गए। बाद में पता चला कि नियमों में अधिकांश अधिकार रोडवेज के एमडी को ही हैं। छुट्टियां मंजूर करने का अधिकार भी रोडवेज एमडी को ही है। इससे मामला एक बार तो शांत हो गया, लेकिन इसके बाद से रोडवेज के अधिकारियों की परेशानियां बढ़ गई हैं। चेयरमैन की मीटिंग या चेयरमैन के बुलाने की सूचना मात्र से ही उनकी त्यौरियां चढ़ने लगती हैं। कई बार मीटिंगों में भी कुछ अधिकारियों को चेयरमैन के गुस्से का कोपभाजन बनना पड़ जाता है।

Tuesday, 12 October 2010

देवराजन को मिली सीबीआई से क्लीनचिट

भूमि संबंधी विवाद में भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री एम.के. देवराजन को क्लीन चिट दे दी है। देवराजन 1977 के पुलिस अधिकारी हैं। आमेर में एक डीडराइटर श्रवणसिंह सामोता को पिछले दिनों भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने पकड़ा था। इसमें यह बात सामने आई थी की सामोता सब रजिस्ट्रार आकाश रंजन के लिए रिश्वत लेता था। इसके बाद रंजन ने देवराजन पर पद के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। इस मामले में सीबीआई ने अब अदालत में डीडराइटर और रंजन के खिलाफ आरोप पत्र पेश करने की तैयारी कर ली है।
पत्नी के नाम से प्लॉट लेने के विवाद में पद के दुरुपयोग का आरोप लगने के बाद सरकार ने उन्हें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के डीजी पद से हटाकर राजस्थान लघु उद्योग निगम (राजसिको) में सीएमडी लगा दिया था। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि स्वच्छ और ईमानदारी छवि के देवराजन पर पद के दुरुपयोग का दाग धुलने से अब उनका अगले साल सम्मानजनक रिटायरमेंट हो सकेगा। इससे पहले देवराजन राजस्थान के पुलिस महानिदेशक के दावेदार थे।

पुलिस वालों के चक्कर में फंस गए कलेक्टर

जयपुर कलेक्टर नवीन महाजन राजधानी में आकर आखिर पुलिस वालों के चक्कर में फंस गए। हुआ यह कि कलेक्टर सम्मेलन में कानून व्यवस्था के मुद्दे पर वैसे तो पुलिस वालों को ही अपने क्षेत्र की पोजीशन बतानी थी, लेकिन कलेक्टरों को भी उनकी मदद में कुछ कहने की इजाजत दी गई थी। इसी का फायदा जयपुर उत्तर के एसपी अशोक नरूका ने उठाया। नरूका दरअसल अपने इलाके में बूचड़खानों को लेकर काफी परेशान थे, लेकिन कहीं इससे मुख्यमंत्री नाराज न हो जाएं, सो उन्होंने यह मुद्दा धीरे से जयपुर कलेक्टर नवीन महाजन को सरका दिया। हुआ भी वहीं, कलेक्टर नवीन महाजन जब कलेक्टर कांफ्रेस में इस मुद्दे पर बोलने लगे तो सीएम ने एक बार उन्हें टोका कि यह एजेंडे का विषय नहीं है। आप एजेंडे पर बोले, फिर भी आपको लगता है कि ये समस्या है तो अलग से लिखकर भेज दें। इसके बाद भी महाजन अपनी बात कहते रहे। आखिर तंग आकर सीएम को उनसे कहना पड़ा कि आपका समय पूरा हो गया, आप बैठ जाइए।

Sunday, 3 October 2010

कौन चाहता है पंचायतराज संस्थाओं में भ्रष्टाचार रोकना

पंचायतराज संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए हाल ही सरकार ने पांच विभाग जिला परिषदों को हस्तांतरित किए हैं। केवल विभाग ही जिला परिषदों को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, प्रारंभिक शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता और कृषि विभागों को फंड, फंक्शन एवं फंक्शनरीज के साथ ट्रांसफर किया है। इतना ही नहीं सरकार ने प्रभावी नियंत्रण के लिए १६ सीसीए जैसे माइनर पेनल्टी के अधिकार भी जिला परिषदों को दिए हैं। जिला परिषदों में आईएएस को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) लगाने की मंशा भी जाहिर की गई है। आरएएस अधिकारियों को अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी (एसीईओ) लगाया गया है। जबकि बाकी विभागों के अधिकारी इनके अधीन काम करेंगे।
राजस्थान पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि पंचायतराज संस्थाओं में खासकर नरेगा को लेकर भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह से सामने आ रहे है, उन्हें रोके जाने की क्या व्यवस्था है? सोशियल ऑडिट का सरपंच और जन प्रतिनिधि ही विरोध कर रहे हैं। अगर किसी अधिकारी या कर्मचारी पर दंडात्मक कार्रवाई करनी है तो उसकी जांच की क्या व्यवस्था होगी? जिला स्तर पर इन विभागों और जिला परिषदों में समन्वय को लेकर भी परेशानी सामने आ सकती है। हो सकता है २० साल की सर्विस वाला डॉक्टर, अथवा आरएएस के समकक्ष योग्यता वाला कोई अफसर उसकी बात ही न सुने। ये भी हो सकता है कि जिला प्रमुख और सीईओ अगर मिल जाएं तो करप्शन रोकने की क्या व्यवस्था होगी। ऐसे में जब सभी विभागों में मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) लगाए गए हैं तो प्रत्येक जिला परिषद स्तर पर एडीशनल एसपी स्तर अथवा एसपी स्तर के अधिकारी को सीवीओ क्यों नहीं लगा दिया जाता। इससे भ्रष्टाचार करने वालों में भी भय रहेगा और योजनाओं में भ्रष्टाचार पर सरकार की निगरानी भी रहेगी।

जूनियर को बॉस बनाने से आरएएस अफसर खफा

राजस्थान प्रशासनिक सेवा के 19 अधिकारियों को हाल ही जारी की गई तबादला सूची ने प्रशासनिक हल्कों में खलबली मचा दी है। हाल ही 1 अक्टूबर को जारी तबादला सूची का सीधा असर खाद्य, नागरिक आपूर्ति विभाग पर पड़ा है। यहां पहले ही अफसरों का टोटा है और कोई अफसर आने को तैयार नहीं था। अब इस सूची में जेडीए में उपायुक्त प्रकाशचंद शर्मा को खाद्य विभाग में अतिरिक्त आयुक्त के पद पर लगा दिया है। प्रकाशचंद शर्मा मौजूदा उपायुक्त चेतन देवड़ा से 5 साल जूनियर बताए जाते हैं। इससे देवड़ा खफा हो गए और उन्होंने नाराजगी प्रकट करने के लिए लंबी छुट्टियां ले ली  हैं। हालांकि देवड़ा पहले से ही इस विभाग से निकलने की जुगत लगा रहे थे।
इधर, हाल ही नवगठित स्टेट फूड कॉरपोरेशन में जाने के लिए कुछ आरएएस अफसर भी जुगत बिठाने में लगे हैं। महाप्रबंधक पद पर पहली नियुक्ति राजसिको की जीएम रजनीसिंह को दी गई है। जबकि फूड कॉरपोरेशन के एमडी ललित मेहरा यहां गृह विभाग के उप सचिव श्रीराम चौरडिया को भी लाने की जुगत बिठा रहे हैं। बुनकर संघ में एमडी के पद पर बैठे वेदप्रकाश भी अब वहां से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं।

वाणिज्यिक सेवा के अफसरों में भी रोष
इधर, इससे पहले 30 सितंबर को जारी तबादला सूची में 7 आरएएस अधिकारियों को वाणिज्यिक कर विभाग में उपायुक्त पदों पर लगाए जाने से वाणिज्यिक कर सेवा के अधिकारियों में असंतोष हो गया है। इन अफसरों ने दो-तीन दिन पहले ही मीटिंग करके इन अधिकारियों को लगाए जाने का कड़ा विरोध भी किया है। इन अफसरों का कहना है कि हाईकोर्ट से विभाग में 6 से ज्यादा आरएएस अफसर लगाए जाने पर रोक है। इन पदों पर विभागीय अधिकारियों को लगाए जाने की मांग है। ताजा सूची से विभाग में कुल आरएएस अफसरों की संख्या बढ़कर 9 हो गई है। वाणिज्यक कर सेवा के अफसरो ने इस संबंध में अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) को ज्ञापन देकर विरोध जताने का भी मन बना लिया है।

Wednesday, 29 September 2010

धर्मसंकट में हैं राजस्थान के पुलिस महानिदेशक

खाद्य, नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री बाबूलाल नागर के खिलाफ आटा पिसाई, शुद्ध के लिए युद्ध अभियान और पीली मटर दाल के आयात की शिकायत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा को धर्म संकट में डाल दिया है। इस मामले की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो कर रहा है। ब्यूरो की अब तक की पड़ताल में पूरे मामले की जिम्मेदारी खाद्य, नागरिक आपूर्ति विभाग के अफसरों पर आ रही है और पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा के भाई आईएएस ओ.पी. मीणा खाद्य इस विभाग में प्रमुख शासन सचिव हैं। आटा पिसाई से लेकर पीली मटर दाल के आयात करने तक सभी फैसले प्रमुख सचिव स्तर पर हुए हैं। इस मामले में खाद्य राज्यमंत्री बाबूलाल नागर ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है, कि उनका काम तो केवल नीति निर्धारण तक ही है। टेंडर आमंत्रित करना, रेट तय करना, टेंडर खोलना और वर्क ऑर्डर देना सभी काम विभागीय अफसर करते हैं।
खाद्य विभाग के प्रमुख सचिव ओ.पी. मीणा हालांकि इस विभाग से निकलना भी चाहते हैं, लेकिन उनके लिए यहां से निकलना संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में अब पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा का धर्म संकट ये है कि वे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अफसरों के कैसे कहें कि इस मामले में विभागीय प्रमुख सचिव मीणा को बख्शें। इधऱ मंत्री के खिलाफ सबूत और तथ्यों की पड़ताल में जुटी एसीबी को अभी खाद्य विभाग से पूरा रिकॉर्ड तक नहीं मिल पा रहा है। एसीबी की जांच भी अफसरों की जवाबदेही और जिम्मेदारी से आगे नहीं बढ़ रही है। ऐसे में संभावना यही बन रही है कि मामले को गुमनाम शिकायत के नाम पर रफादफा किया जा सकता है।

Monday, 27 September 2010

आईएएस संधू ने अब दिल्ली जाने का इरादा छोड़ा

भारतीय प्रशासनिक सेवा में 1980 बैच के आईएएस अधिकारी गुरुदयालसिंह संधू ने अब प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जाने का इरादा फिलहाल छोड़ दिया है। दो महीने पहले उनका चयन भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव पद के लिए हो गया था। पॉवर गेलेरी की खबर है कि संधू ने अतिरिक्त सचिव का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। इससे पहले वे भारत सरकार में ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर रह चुके हैं। संधू अभी राजस्थान में स्वायत्त शासन, नगरीय विकास एवं आवासन विभाग के प्रमुख शासन सचिव हैं। वे जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के चेयरमैन भी हैं।
संधू के अतिरिक्त सचिव का प्रस्ताव अस्वीकार करने के बारे में पॉवर गेलेरी की खबर है कि जयपुर मेट्रो का प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ड्रीम प्रोजेक्ट है। इसे समयबद्ध तरीके से इसी सरकार के कार्यकाल में पूरा करना है, इसलिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ही संधू जयपुर में ही रुकने के लिए कहा है। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि अब विकास योजनाओं को न केवल गति मिले बल्कि वे निश्चित अवधि में भी पूरी हों।

Sunday, 26 September 2010

राजस्थान में अब सत्ता और संगठन के भी अखबार

राजस्थान में संभवतः यह पहली बार हो रहा होगा जब सत्ताधारी दल में सत्ता और संगठन के शीर्ष नेताओं से जुड़े सिपहसालार एक साथ दैनिक अखबार शुरू कर रहे हैं। खास बात ये कि दोनों ही अखबारों के टाइटल (नाम) भी मिलते-जुलते हैं। मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत के नजदीकी माने जाने वाले श्री शिवचरण माली हालांकि काफी समय से लोकदशा समाचार पत्र का साप्ताहिक प्रकाशन करते रहे हैं। हाल के विधानसभा चुनाव में उन्होंने इस समाचार पत्र के माध्यम से गहलोत की काफी मदद भी की थी। गहलोत के शासन में आते ही लोकदशा को दैनिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित करने की घोषणा कर दी गई। इतना ही नहीं इसके लिए संपादकीय विभाग में नियुक्तियां भी कर ली गई हैं। श्री शिवचरण माली पहले राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में अध्यक्ष पद के दावेदार भी थे, लेकिन बाद में उन्होंने केन्द्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष डॉ। सी.पी. जोशी की खातिर गहलोत के कहने पर नामांकन वापस ले लिया था।
इधर, लोकदशा के प्रकाशन की तैयारियां चल ही रही थीं कि राजस्थान में ही सिरोही के बिल्डर श्री भवानी शंकर शर्मा ने लोक संपर्क नाम से दैनिक समाचार पत्र के प्रकाशन की घोषणा कर दी। इतना ही लोकसंपर्क की वेबसाइट भी लांच कर दी गई है। समाचार पत्र प्रकाशन के लिए संपादकीय विभाग में भर्तियां चल रही हैं। श्री भवानीशंकर शर्मा को केन्द्रीय मंत्री एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ। सी. पी. जोशी का काफी नजदीकी बताया जाता है। शर्मा ने इससे पहले भी मीडिया में आने की कोशिश की थी। अब देखना है कि राजस्थान के विकास और राजनीति में इन समाचार पत्रों की क्या भूमिका रहती है।

Saturday, 25 September 2010

पोस्टिंग लेने से बच रहे हैं आईएएस और आरएएस अफसर

राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी में संभवतः यह पहला मौका है, जब खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग में आईएएस और आरएएस अफसर पोस्टिंग से बच रहे हैं। जो विभाग में लगे हुए हैं उनमें से कुछ लोग यहां से निकल चुके हैं और जो बाकी बचे हैं वे निकलन के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। इसकी वजह केवल एक ही है कि खाद्य, नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री बाबूलाल नागर के साथ पटरी नहीं बैठ पाना। उनके व्यवहार से भी अफसर इस कदर दुखी हैं कि वे इस विभाग में काम करने को कतई राजी नहीं है। हालांकि विभाग के केबिनेट मंत्री खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं, लेकिन वहां तक हर कोई अफसर अपनी बात कह पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

दूसरी वजह यह भी है कि आटा पिसाई, शुद्ध के लिए युद्ध अभियान और पीली मटर की दाल के आयात में भ्रष्टाचार का ठप्पा लग चुका है। नाम भले ही राज्यमंत्री नागर का आ रहा हो, लेकिन रिकॉर्ड के हिसाब से तो अफसर ही फंसते हैं। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच का सामना भी अफसरों को ही करना पड़ रहा है। राज्यमंत्री के व्यवहार के कारण राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी ओ. पी। यादव, उपायुक्त अजय असवाल, गजानंद शर्मा पहले ही यहां से निकल चुके हैं। अब चेतन देवड़ा विभाग में रह गए हैं, जो पूरा कामकाज संभाले हुए हैं। देवड़ा भी यहां से जाने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक अपनी बात पहले ही पहुंचा चुके हैं। विभाग के प्रमुख सचिव ओ. पी. मीणा भी इस पूरे मामले और मंत्री के व्यवहार को लेकर काफी व्यथित हैं। वे पहले ही सीएमओ को यहां से हटने के लिए आग्रह कर चुके हैं। पिछली तबादला सूची में उनका नाम भी था, लेकिन ऐनवक्त पर मीणा और कार्मिक सचिव खेमराज का नाम काट दिया गया। इसकी वजह ये है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद इस पक्ष में नहीं हैं कि खाद्य आपूर्ति जैसे विभाग को एकदम अफसरों से विहीन कर दिया जाए। क्योंकि नया अफसर आने को तैयार नहीं है। अतिरिक्त आयुक्त के पद के लिए पहले जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग में उप सचिव आर.सी. सोलंकी का नाम सुझाया गया था, लेकिन जैसे ही पता चला तो सोलंकी ने जाकर मंत्री को मना कर दिया। उनके बाद अब गृह विभाग में उप सचिव श्रीराम चौरड़िया का नाम चला है, लेकिन वे भी वहां जाने के पक्ष में नहीं है। इस पद के लिए अभी तक किसी भी आरएएस अफसर ने हां नहीं भरी है। इसी तरह पहले यहां सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी गोविंद पारीक को लगाया गया था, लेकिन पारीक ने भी यहां आने से मना कर दिया।

Thursday, 23 September 2010

राजस्थान में आज भी चल रहा है खडाऊ से राज

भगवान श्रीराम के वनवास चले जाने के बाद उनके छोटे भाई भरत ने १४ साल तक अयोध्या में उनकी खडाऊ रखकर ही राज किया था। ठीक वैसे ही राजस्थान में पिछले नौ महीने से मुख्य निर्वाचन अधिकारी का राज चल रहा है। इस पद पर तैनात मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्री विनोद जुत्शी लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद १७ दिसंबर को निर्वाचन आयोग दिल्ली में स्पेशल ड्यूटी पर चले गए थे। इसके बाद १२ जनवरी,२०१० को इसके लिए उनके औपचारिक आदेश भी जारी हो गए। परंतु राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पद का कार्यभार अभी भी उनके पास ही है। इस नाते सचिवालय के मुख्य भवन में तीसरी मंजिल पर बने कक्ष पर उनकी नाम पट्टिका आगंतुकों को आकर्षित कर रही है, लेकिन जब दरवाजा खोलकर देखते हैं तो कुर्सी खाली ही नजर आती है। निर्वाचन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर ही निर्णित होने वाली कोई आवश्यक फाइल होती है तो उसे दिल्ली भेजकर निकलवाना पड़ता है। क्या करें, इस पद का कार्यभार अभी भी जुत्शी के ही पास जो है। पॉवर गेलेरी की खबर है कि इस पद के लिए राज्य सरकार ने पहले जो पैनल भेजा था, उसे निर्वाचन आयोग ने निरस्त कर दिया था। आयोग ने चिकित्सा शिक्षा सचिव मुकेश शर्मा के नाम के साथ तीन अफसरों का दुबारा पैनल मांगा था। यह पैनल भेज दिया गया है, संभवतः जल्दी ही राजस्थान को नया मुख्य निर्वाचन अधिकारी मिल जाएगा।

Wednesday, 22 September 2010

अब चिट्ठियों से भी डरने लगी है राजस्थान पुलिस

गुजरात के सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में राजस्थान के दो-तीन अफसर क्या फंसे अब राजस्थान पुलिस मुठभेड़ और इनकी जांच से जुड़े लोगों के नाम तथा चिट्ठियों से भी डरने लगी है। हाल ही कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर निकली क्वींस बेटन रिले के सिलसिले में खेल एवं युवा मामले विभाग के सचिव आईएएस रोहित कुमार सिहं ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस महकमे को कुछ पत्र लिखे थे। जब ये पत्र पुलिस मुख्यालय में पहुंचे तो पत्र में ऊपर रोहित कुमार सिहं का नाम देखकर एकबारगी तो हलचल मच गई। एक आला अफसर ने तो रोहित कुमार सिहं को कह भी दिया कि आप पत्र लिखने के बजाय फोन पर ही फरमा दिया करो। पत्रों से हम लोग परेशानी महसूस करने लगते हैं। इसकी वजह ये है कि रोहित कुमार सिंह दारासिंह मुठभेड़ मामले की प्रशासनिक जांच में पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े कर चुके हैं। सीबीआई ने इसी रिपोर्ट को जांच का आधार बनाया है। सोहराबुद्दीन, तुलसी प्रजापत के साथ में दारासिहं उर्फ दारिया मुठभेड़ प्रकरण की आंच भी राजस्थान पुलिस तक पहुंच रही है।

गृह मंत्री जी को ये क्या हो गया ?

राज्य के गृह मंत्री शांति धारीवाल इन दिनों अपनी कार्य शैली और स्वभाव को लेकर पावर गैलेरी मे काफी चर्चित हैं। उनके व्यवहार और स्वभाव को लेकर पुलिस महकमे से लेकर सफाई महकमे तक के लोग आश्चर्यचकित हैं। सबसे ज्यादा वे लोग चकित हैं जो पिछले कार्यकाल में भी धारीवाल के साथ काम कर चुके थे। उनके निजी स्टाफ की भी कुछ ऐसी ही शिकायत है। खबरीलाल की खबर है कि धारीवाल के स्वभाव और व्यवहार में बदलाव का मुख्य कारण ८ सिविल लाइंस से पर्याप्त रेस्पांस और कामकाज में फ्री हैंड नहीं मिलना है। खबर है कि धारीवाल खाकी महकमे में कुछ सालेगिरामों को इधर-उधर करने का प्रयास करते हैं। फाइल ८ सिविल लाइंस में जाकर डम्प हो जाती है। यही हाल सफाई महकमे से जुड़े लोगों का है। इसी खीझ को कई बार वे मिलने वाले कार्यकर्ताओं, अफसरों और स्टाफ पर निकाल लेते हैं।

Wednesday, 15 September 2010

तबादला सूचियां 24 तक टलीं

आईएएस, आरएएस और आईपीएस अफसरों की तबादला सूचियां अब 24 सितंबर तक टाल दी गई हैं। इस बीच २४ सितंबर को अयोध्या में राममंदिर मुद्दे पर उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को देखते हुए कानून व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से राज्य पुलिस सेवा के कुछ अफसरों को एक-दो दिन में ही खाली पदों पर पोस्टिंग दी जा सकती है। इनमें कोटा और जोधपुर में एडीशनल एसपी के पदों को तत्काल भरा जाना जरूरी है। जोधपुर के एडीशनल एसपी राजेशसिंह को हाल ही डॉक्टरों की हड़ताल के कारण हटाया गया था।
पावर गैलेरी में चर्चा है कि आईएएस में कई पद खाली पडे़ हैं, जबकि कई अफसरों को दो-दो पदों का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा हुआ है। इसलिए एक और सूची जारी की जा सकती है। आरएएस अफसरों की भी सूची तैयार पड़ी है, इसे भी 24 सितंबर के बाद ही जारी किया जाएगा।
पुलिस महकमे में भी आईपीएस अफसरों की तबादला सूची को लेकर काफी उत्साह बना हुआ है। इसकी वजह यह है कि पिछले महीने 8 पुलिस अधीक्षकों को डीआईजी के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। परन्तु इन्हें अभी तक भी पोस्टिंग नहीं दी गई है। ये अधिकारी डीआईजी बनकर भी एसपी का काम कर रहे हैं। मुखबिर की खबर है कि डीआईजी पद पर पदोन्नत हुए अधिकारी खुद भी एसपी के पद पर ही बने रहना चाहते हैं। इसकी वजह यह है कि अफसरी करने का जो मजा एसपी के पद पर है, वह डीआईजी बनने में कहां? इसलिए पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से पहले ये अधिकारी भी पोस्टिंग नहीं चाहते हैं।

Monday, 13 September 2010

वी.एस. सिंह बन सकते हैं अतिरिक्त मुख्य सचिव

भारतीय प्रशासनिक सेवा में 1978 बैच के अधिकारी श्री वी. एस. सिंह को अतिरिक्त मुख्य सचिव बनाया जा सकता है। सिंह अभी पर्यावरण एवं वन विभाग में प्रमुख सचिव हैं। इसी बैच में अरविंद मायाराम और राजीव महर्षि के नाम भी हैं, परंतु दोनों ही अधिकारी इस समय दिल्ली में पदस्थापित हैं। अतिरिक्त मुख्य सचिव का एक पद हाल ही सलाउद्दीन अहमद के मुख्य सचिव बनने से खाली हुआ है। इस पद के लिए स्क्रीनिंग हो चुकी है।
हालांकि इस पद के लिए 1977 के अधिकारी श्री बी. बी. मोहांति दावेदार हैं। परंतु उनके खिलाफ खेल एवं युवा मामले विभाग में प्रमुख सचिव रहते सवाई मानसिंह स्टेडियम में नियम विरुद्ध डेयरी बूथ आवंटित करने का मामला चल रहा है। इस मामले में राजस्व मंडल के तत्कालीन चेयरमैन श्री राकेश हूजा अपनी रिपोर्ट में अनुशासनात्मक कार्यवाही की सिफारिश करके गए हैं। इस आधार पर कार्मिक विभाग प्रकरण को चार्जशीट की अभिशंसा के साथ मुख्यमंत्री को भिजवा चुका है। कार्मिक विभाग के सूत्रों का कहना है कि पदोन्नति के लिहाज से कमेटी उन्हें पदोन्नति के योग्य मान चुकी है। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विवादों के कारण मोहांति को शायद ही एसीएस बनाएंगे। मोहांति इससे पहले अपने स्टाफ के साथ मारपीट करने को लेकर विवादों में आए थे।

Sunday, 12 September 2010

अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) बनने से खुश नहीं हैं देव

भारतीय प्रशासनिक सेवा में 1977 बैच के अधिकारी पी. के. देव अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह, जेल, नागरिक सुरक्षा और मुख्य सतर्कता अधिकारी बनाए जाने से शायद खुश नहीं हैं। नए पद पर ज्वाइन करने के कुछ दिन बाद वे अवकाश पर चले गए। देव अपनी मित्र मंडली में कह भी चुके हैं कि इस पद के लिए मेरा चयन शायद ठीक नहीं है। इस तरह के पदों पर काम करने का मेरा ज्यादा अनुभव भी नहीं रहा है। वे मानते हैं कि गृह सचिव का पद काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन काम उनकी रुचि का नहीं है। देव इससे पहले राजस्थान रोडवेज के सीएमडी थे। इससे पहले वे दिल्ली में पदस्थापित थे। गैलेरी में चर्चा है कि देव ज्यादा दिन इस पद पर नहीं रहेंगे। संभवत वे दिल्ली जाने की तैयारी में है। पुलिस महकमे और खबरीलालों में चर्चा है कि पहले वाले गृह सचिव से तो नए गृह सचिव ज्यादा अच्छे हैं। पुलिसिया डॉग स्क्वायड भी गलियारों में नए गृह सचिव को तलाशने में जुट गई है।

Saturday, 11 September 2010

सिविल लाइंस का बंगला जिसमें जो रहा,वो गया

खाद्य, नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री बाबूलाल नागर से ज्यादा उनका बंगला इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चित है। इसकी वजह यह कि वे जिस बंगले में रहते हैं, उसमें रहने वाले या तो जबरदस्त विवादों में घिरे और फिर जीतकर भी नहीं आए। नागर इन दिनों खाद्य विभाग में शुद्ध के लिए युद्ध अभियान, पीली मटर की दाल और आटे की पिसाई में भ्रष्टाचार को लेकर विवादों में हैं। वे मंत्री बनने के बाद से ही विवादों में रहे हैं। नागर सिविल लाइंस फाटक के पास वाले जिस बंगले में रहते हैं। उसमें उनसे पहले तत्कालीन स्वायत्त शासन राज्यमंत्री प्रतापसिंह सिंघवी रहते थे। सिंघवी जमीनों की धारा ९० बी को लेकर विवादों में आए। उसके बाद वे तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधराराजे की देवी के रूप में पूजा करके विवादों में आए थे। स्थिति यह बनी कि उनसे स्वायत्त शासन विभाग ही ले लिया गया। उसके बाद वे चुनाव हार गए। इस बंगले में सिंघवी से पहले मौजूदा सांसद महेश जोशी रहते थे। वे गहलोत सरकार में संसदीय सचिव थे और विधानसभा का चुनाव हार गए थे। जोशी से पहले इसी बंगले में मंगलाराम कोली मंत्री के रूप में रहे और चुनाव हार गए। कोली से पहले यह बंगला मौजूदा पर्यटन मंत्री बीना काक के पास रहा था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह बंगला शुभ नहीं है। हो सकता है नागर को भी इसकी कीमत चुकानी पड़े।

Friday, 10 September 2010

राज्यमंत्रियों का टूट रहा है सब्र का बांध

राजस्थान सरकार के राज्यमंत्रियों में धीरे धीरे असंतोष पनप रहा है। इसकी वजह उन्हें केबीनेट मंत्रियों द्वारा काम और अधिकारों का नहीं देना है। अपनी उपेक्षा को लेकर शिक्षा राज्यमंत्री मांगीलाल गरासिया अपने केबीनेट मंत्री मास्टर भंवरलाल मेघवाल का विरोध कर चुके हैं। वे तो इस बारे में मुख्यमंत्री को शिकायत भी दर्ज करवा चुके हैं। तकनीकी शिक्षा राज्यमंत्री मुरारीलाल मीणा,

खेमराज क्यों रह गए और राकेश वर्मा को ऐसी पोस्टिंग क्यों

राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों पिछले सप्ताह जारी की गई तबादला सूची चर्चा का विषय बनी हुई है। पावर गैलेरी में केवल एक ही चर्चा है कि इस सूची में कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव खेमराज का तबादला क्यों नहीं हुआ। सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव राकेश वर्मा को सूचना एवं प्रौद्योगिकी जैसी ठंडी पोस्टिंग क्यों दी गई। दरअसल पहले ही यह तय माना जा रहा था कि प्रमुख गृह सचिव प्रदीप सेन और कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव खेमराज की कार्य प्रणाली से मुख्यमंत्री खुश नहीं थे, इसलिए इनका तबादला तो होना ही था। परन्तु जब लिस्ट आई तो खेमराज का तबादला नहीं होने पर लोगों को आश्चर्य हुआ।
सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव राकेश वर्मा को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नजदीकी माना जाता है, इसलिए लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिलना तय है, लेकिन सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग में पोस्टिंग को देखकर आश्चर्य हुआ। पावर गैलेरी में चर्चा है कि वर्मा ऊर्जा विभाग में प्रमुख सचिव लगना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई सिफारिशें भी करवाईं। इससे नाराज होकर सीएम ने उन्हें सूचना एवं प्रौद्योगिकी जैसे विभाग में पोस्टिंग दी।
खाद्य, नागरिक आपूर्ति विभाग के प्रमुख सचिव ओ.पी. मीणा भी वहां से निकलने के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन उन्हें सीएम ने वहां से हटाना उचित नहीं समझा। ओ.पी. सैनी को डेयरी एवं पशुपालन विभाग से उद्यानिकी में लगाया है। सैनी की पोस्टिंग को भी डेयरी राज्यमंत्री बाबूलाल नागर की नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है। नागर ने सैनी को इस कार्यकाल में जांच के लिए जितने भी पत्र लिखे, सैनी ने उन सभी को फाइल कर दिया और एक का भी जवाब नहीं दिया। प्रमुख गृह सचिव प्रदीप सेन से नाराजगी की वजह उनकी कार्य प्रणाली है। प्रमुख गृह सचिव के रूप में उनकी पुलिस महानिदेशक से बन नहीं रही थी।

Sunday, 29 August 2010

अब सोशल हो रहे हैं राजस्थान के ब्यूरोक्रेट्स

राजस्थान के आईएएस, आरएएस और आईपीएस अफसर शायद सोसायटी से कटाव महसूस कर रहे हैं। इसलिए इन अफसरों ने अब सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा लिया है। ट्विटर और ओरकुट के बाद अब ये अफसर फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर भी दिखने लगे हैं। फेसबुक पर दिखने वाले अधिकारियों में आईएएस रोहित कुमार सिहं, अशोक संपतराम, नीलकमल दरबारी, मुग्धा सिन्हा, किरन सोनी गुप्ता, मधुकर गुप्ता, राजेश यादव, अखिल अरोड़ा, आरएएस अफसरों में अश्विनी कुमार शर्मा, पंकज ओझा, आईपीएस नीनासिंह सहित कई आईपीएस अधिकारी दिखने लगे हैं।

Tuesday, 24 August 2010

कमिश्नरी की लड़ाई में फंसे पुलिस अफसर

राजस्थान पुलिस के आला अफसर इन दिनों प्रदेश की कानून व्यवस्था को छोड़कर पुलिस कमिश्नर बनने की लड़ाई में फंसे हुए हैं। अधिकांश आला अफसर गुटबाजी में फंसे हैं। इनमें कुछ अधिकारी तो एडीजी (अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ) स्तर के अधिकारी को कमिश्नर लगवाना चाहते हैं जबकि दूसरे गुट के लोगों का दबाव है कि आईजी स्तर का अधिकारी कमिश्नर लगे। इसी कलह की वजह से कमिश्नर प्रणाली लागू नहीं हो पा रही है। पहले यह १५ अगस्त से लागू होनी थी। अब भी कमिश्नर प्रणाली का आसानी से लागू हो पाना आसान नहीं लग रहा है। जयपुर में इससे पहले करीब २५ साल पहले भी जयपुर में कमिश्नर प्रणाली लागू करवाने के प्रयास हुए थे। तब इसकी पूरी तैयारी हो गई थीं, कमिश्नर बनने वाले पुलिस अफसरों ने नई वर्दी भी सिलवा ली थी, लेकिन ऐनवक्त पर सरकार ने फैसला रद्द कर दिया। पॉवर गेलेरी में चर्चा है कि पुलिस अफसरों की इसी लड़ाई में इस बार भी कमिश्नरी की खीर फैल सकती है। इसकी वजह यह है कि खुद कमिश्नर बनने के प्रयास में पुलिस अफसर ही एक-दूसरे को निबटाने में लगे हैं। आईपीएस एम.के. देवराजन को जमीन विवाद में लपेटकर पुलिस मुख्यालय से हटाने के पीछे भी यही मंशा बताई जा रही है।

Monday, 23 August 2010

आदेशार्थ- ओवलोकनार्थ

राजस्थान के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग में इन दिनों योग्य अफसरों की तलाश है। विभाग में कार्यरत राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों से विभागीय आयुक्त प्रेमसिंह मेहरा एवं उच्चायुक्त संतुष्ट नहीं हैं। उनके कामकाज की शैली और काम टालू प्रवृत्ति से कमिश्नर परेशान हैं। पॉवर गेलेरी में सहयोगी अफसरों से चर्चा में कमिश्नर ने कहा कि ये अफसर फाइल पर आदेशार्थ और अवलोकनार्थ के आगे कुछ लिखते ही नहीं हैं। ऐसे में कोई निर्णय लें भी तो कैसे। वे कहते हैं कि या तो इन जैसे आरएएस अफसर कुछ और यहां लगा देने चाहिए अथवा इनकी जगह योग्य अफसर दिए जाने चाहिए। इससे कम से कम काम तो समय पर होगा।

Saturday, 2 January 2010

सरकार आखिर कितना टैक्स लगाएगी

अगले महीने ही केन्द्र और राज्य सरकारों के बजट आने वाले हैं। आर्थिक तंगी और मंदी से जूझ रहे आम आदमी का बजट के नाम से ही तनाव बढ़ जाता है। बजट मतलब आम जरूरत की चीजों के दामों में बढ़ोत्तरी, नए-नए टैक्स, सरचार्ज, सैस आदि का भार। यानी विकास कार्यों के नाम पर जन प्रतिनिधियों और अफसरों के एशो-आराम और मोटे-मोटे खर्चों का इंतजाम। हालत यह हो गई है कि मध्यम वर्गीय परिवार यानी आप हम कमाई पर इनकम टैक्स दे रहे हैं और खर्चा करने में भी वैट तथा सर्विस टैक्स देना पड़ रहा है। बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी स्कूलों में मोटी फीस चुकाने के बाद भी मोबाइल, टेलीफोन सहित कई तरह के बिलों में दो-दो एज्यूकेशन सैस देने पड़ रहे हैं। सड़क पर चलने की कितनी बड़ी कीमत वसूली जा रही है शायद इसका अंदाजा भी हमें नहीं है। वाहन की खरीद पर परिवहन विभाग रोड़ टैक्स लेता है। वाणिज्यिक कर विभाग वैट और पंजीयन एवं मुद्रांक कर विभाग स्टाम्प ड्यूटी ले रहा है। इस पर भी केन्द्र सरकार सड़कों की मरम्मत के नाम पर दो रुपए लीटर रोड़ सैस, राजस्थान सरकार पचास पैसे प्रति लीटर रोड सैस ले रही है। हाईवे पर हमें टोल टैक्स चुकाना पड़ रहा है। यानी एक सड़क के लिए तीन टैक्स देने पड़ रहे हैं। इस पर भी शहरों में चुंनिंदा इलाकों को छोड़कर सड़कों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। अब फिर टैक्स और सैस लगाने की तैयारी की जा रही हैं और हम चुपचाप यह सब सहन कर रहे हैं। आखिर सरकार लोगों को बेहतर सुविधाएं देकर आर्थिक संसाधन क्यों नहीं जुटानी चाहती।